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Anupasthit Pita (Absent Father Syndrome)

Anupasthit Pita (Absent Father Syndrome)

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Anupasthit Pita (Absent Father Syndrome)

Länge:
389 Seiten
3 Stunden
Freigegeben:
Oct 11, 2019
ISBN:
9781393821175
Format:
Buch

Beschreibung

यह पुस्तक उन परिलक्षणों को संबोधित करती है जो किसी संतान में पिता के बिना उसे भावनात्मक रूप में खोखला कर देती है, चाहे पिता की मृत्यु हो गयी हो या वह मनोवैज्ञानिक रूप से दूर हो गए हों अथवा संतान के साथ सम्बन्ध समाप्त हो गए हों या संतान पिताहीन हो गयी होI यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो अपने खोये हुए पिता की प्रतिध्वनि को अपने अंतराल में सुनते हैं I यह पिता के साथ रूबरू नए रिश्तों के बारे में हैI

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डॉ. मोरारजी पीसे, एमडी(MD), मेडस्टार मॉन्टगोमरी मेडिकल सेंटर और मेडस्टार जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी अस्पताल में एक बोर्ड-प्रमाणित बाल रोग विशेषज्ञ और नियोनेटोलॉजिस्ट हैं। डॉ. पीसे उन नवजात शिशुओं की देखभाल करने में माहिर हैं, जो देर से जन्म लेने वाले शिशुओं, समय से पहले या गंभीर रूप से बीमार शिशुओं के रूप में पैदा होते हैं। डॉ. पीसे औसतन 30 से 40 सप्ताह की उम्र के शिशुओं की देखभाल करते हैं, जो ज्यादातर सांस लेने और पोषण संबंधी चुनौतियों का सामना करते हैं।

डॉ. पीसे के पास कई नवजात उपकरण आविष्कार, एक पेटेंट और कुछ पेटेंट लंबित हैं। उन्होंने अभिनव नवजात शैक्षिक सामग्री को आईफोन ऐप के रूप में प्रकाशित किया है और यह नियोनेटोलॉजी बोर्ड प्रमाणपत्रों से संबंधित दो पुस्तकों के प्राथमिक लेखक हैं। देखभाल के लिए डॉ. पीसे का दृष्टिकोण पूर्ण और खुले संचार पर केंद्रित है, पूरे नवजात प्रभाग का प्रतिबिंब है। माता-पिता के पास डॉ. पीसे तक पूरी पहुंच है कि वे न केवल अपने बच्चे की देखभाल के बारे में अधिक से अधिक जान सकें, बल्कि किसी भी समय प्रश्नों या चिंताओं के माध्यम से बात कर सकें। रोगी देखभाल के अलावा डॉ. पीसे नवजात नवजात डोरियों, एक अद्वितीय भ्रूण-नवजात समस्या से संबंधित अनुसंधान में शामिल हैं।

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में बाल रोग के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में डॉ. पीसे अगली पीढ़ी के चिकित्सकों, बाल रोग विशेषज्ञों और नियोनेटोलॉजिस्ट को पढ़ाने में भी शामिल हैं। डॉ. पीसे मेडिकल छात्रों को व्यावसायिक छात्रों के व्यावसायिक पहचान गठन में सक्रिय रूप से शामिल होने वाले क्योर पर्सनेलिस के हिस्से के रूप में भी उल्लेख करते हैं और जॉर्जटाउन संकाय विकास समिति के सदस्य भी हैं।

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Morarji Peesay, MD, is a board-certified pediatrician and Neonatologist at  MedStar Montgomery Medical Center and MedStar Georgetown University Hospital.

Dr. Peesay specializes in caring for newborns who are born as late preterm infants, premature or critically ill infants. Dr. Peesay cares for infants born at an average of 30 to 40 weeks old, who most often face breathing and nutritional challenges.

Dr. Peesay has several neonatal device inventions, one patent and few patents pending. He has published innovative neonatal educational material as iPhone apps and is primary author of two books related to Neonatology Board certifications. 

Dr. Peesay's approach to care focuses on complete and open communication, a reflection of the entire neonatal division. Parents have complete access to Dr. Peesay to not only know as much as possible about the care of their child, but to also talk through questions or concerns at any time.

In addition to patient care, Dr. Peesay is involved in research related to neonatal nuchal cords, a unique fetal/neonatal problem.  As an Associate Professor of pediatrics at Georgetown University School of Medicine, Dr. Peesay is also involved in teaching the next generation of physicians, pediatricians and neonatologists. Dr. Peesay also mentors Medical students as part of Cura Personalis actively involved in Professional Identity Formation of medical students and is also a member of Georgetown Faculty Development Committee.

Freigegeben:
Oct 11, 2019
ISBN:
9781393821175
Format:
Buch


Buchvorschau

Anupasthit Pita (Absent Father Syndrome) - Dr. Morarji Peesay (MBBS MD FAAP)

लक्षण

राजमंगल प्रकाशन

An Imprint of Rajmangal Publishers

मूल्य : 250/- रू.

ISBN : 978-9388202664

Published by :

RajmangalPublishers

201, Quarsi, Ramghat Road

Aligarh-202001, (UP) INDIA

Cont. No. +91- 7017993445

www.rajmangalpublishers.com

rajmangalpublishers@gmail.com

sampadak@rajmangalpublishers.in

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प्रथम संस्करण : सितम्बर 2019

प्रकाशक : राजमंगल प्रकाशन

राजमंगल प्रकाशन बिल्डिंग, 201,  सांगवान, क्वार्सी,

रामघाट रोड, अलीगढ़, उप्र. - 202001

फ़ोन : +91 - 7017993445

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First Published : Sept 2019

Printed by : Thomson Press India LTD & Repro India LTD

eBook by : Rajmangal ePublishers (Digital Publishing Division)

Cover Design : Rajmangal Arts

Copyright © Dr. Morarji Peesay

This is a work of fiction. Names, characters, businesses, places, events, locales, and incidents are either the products of the author’s imagination or used in a fictitious manner. Any resemblance to actual persons, living or dead, or actual events is purely coincidental. This book is sold subject to the condition that it shall not, by way of trade or otherwise, be lent, resold, hired out, or otherwise circulated without the publisher’s prior consent in any form of binding or cover other than that in which it is published and without a similar condition including this condition being imposed on the subsequent purchaser. Under no circumstances may any part of this book be photocopied for resale. The printer/publishers, distributer of this book are not in any way responsible for the view expressed by author in this book. All disputes are subject to arbitration, legal action if any are subject to the jurisdiction of courts of Aligarh, Uttar Pradesh, India

मेरी हर कहानी मुझे नया बनाती है I

मैं ख़ुद को बनाने के लिए लिखता हूँ I

-ओक्टेविया ई बटलर

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स्नेहिल आदर के साथ

मेरे माता-पिता को समर्पित

~~

––––––––

यह फोटो एक कलश है जिसे रुबिन वेस कहते हैं I १९१५ में एडगर रुबिन ने इसे यह आकृति देकर बनाया था जिसमे यह कलश भी दिखायी देता है और एक जोड़ा चेहरा भी I इससे यह संकेत मिलता है कि किसी वस्तु को साधारण तरीके से देखने के बाद और कुछ जानने के लिए और निरीक्षण करना पड़ता है I 

आशा है इस पुस्तक के ज़रिये अनुपस्थित पिता लक्षण के रहस्य पर अधिक अंतरदृष्टि दे सकूँगा I

~~

अनुक्रमणिका

शीर्षक      पृष्ठ संख्या

प्रस्तावना

अध्याय 1 : पिता और बचपन

अध्याय २ : पिता का इतिहास

अध्याय ३ : पिताहीनता के प्रभाव

अध्याय 4 : खोये पिता का बोझ

अध्याय ५ : पिता का आनुवांशिक विज्ञान

अध्याय ६ : अनुपस्थित पिता के लक्षण

~~

प्रस्तावना

यदि आज मैं जो हूँ, उसे छोड़ दूँ

तो नए आयाम पा सकता हूँ I

-लाओ ज़ू

अक्सर छिपे राज़ खुलने पर विवादास्पद हो जाते हैं I जो राज़ मै खोलने जा रहा हूँ, छिपा हुआ नहीं भी हो सकता है लेकिन संभवतः विवादास्पद अवश्य है I यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जिन्हें अपने पिता से तारीफ़, नजदीकी और दोस्ती की चाहत रही है I यह पुस्तक उन परिलक्षणों को संबोधित करती है जो किसी संतान में, पिता के बिना, उसे भावनात्मक रूप में खोखला कर देती है, चाहे पिता की मृत्यु हो गयी हो या वह मनोवैज्ञानिक रूप से दूर हो गए हों और संतान के साथ सम्बन्ध समाप्त हो गए हों तथा संतान पिताहीन हो गया हो I यह पुस्तक उन लोगों के लिए है जो अपने खोये हुए पिता की प्रतिध्वनि को अपने अंतराल में सुनते हैं I यह पिता के साथ रूबरू नए रिश्तों के बारे में है I

अनुपस्थित पिता के बारे में विश्व में नए तरह की दिलचस्पियाँ बढ़ रही हैं और ‘नेशनल फादर इनिशिएटिव’ ने पिता की भूमिका के सकारात्मक प्रभाव पर कुछ तथ्य भी प्रकाशित किये हैं I यह देखा गया है कि जिन किशोरों का बचपन पिता के साथ बीता है उनमे मनोवैज्ञानिक कष्ट या दुःख कम होता है I पिताओं का स्नेह पाने वाले बच्चे काफी हद तक नशे से दूर रहते हैं, चोरियां नहीं करते हैं और स्कूल से ग़ैर हाज़िर नहीं होते हैं I कुछ शोध बताते हैं कि पिता की अनुपस्थिति काफी हद तक बाल-शोषण की तरफ अग्रसर करती है I कुछ अध्ययन यह भी कहते हैं कि पिता की चाहत एक या दो वर्षों से ही शुरू हो जाती है, नन्हे बच्चों में

‘अनुपस्थित पिता’ का एहसास अनोखा है, जैसे जैसे वह बड़े होते हैं उनमे अवसाद, आत्महत्या और क्रूरता (प्रवाही व्यवहार) की भावनाएं बढ़ती जाती हैं I

तीन वर्ष होने तक बच्चे के साथ पिता के घुलमिल कर रहने पर बच्चे में यौन दुर्व्यवहार या उत्पीडन की संभावना कम हो जाती है I यहाँ तक कि पिता के साथ कभी कभी स्पर्श भी बच्चे के स्वास्थ्य में अर्थपूर्ण प्रभाव देता है I लेकिन हमेशा का अलगाव, बच्चे में दीर्घकालीन क्लेश और दुःख पैदा कर सकता है I माँ-बाप के तलाक से युवा बच्चों को बहुत दुःख होता है; वैसे ही जैसे कि पिता मर गए हों I जिन बच्चों के पिता अनुपस्थित होते हैं उन्हें पढाई में परेशानी होती है ख़ास तौर पर गणित और विज्ञान को सीखने में I लेकिन ‘अनुपस्थित पिता और उसका बचपन पर प्रभाव’ पर किये गए हाल ही के अध्ययन से कुछ विवादास्पद आंकड़े भी मिलते हैं, ख़ास तौर पर तब, जब चकरा देने वाले वातावरण और आनुवांशिक कारक एक साथ बच्चे पर प्रभाव डालते हों I "अनुपस्थित पिता’ पर बहुत सी पुस्तकें लिखी गयी हैं लेकिन बहुत कम पुस्तकें ऎसी हैं जिनमे बच्चे की भावनाओं में ‘अनुपस्थित पिता’ के एहसास पर लिखा गया हो I यह पुस्तक अनुपस्थित पिता के द्वारा अनुपस्थित पिता को समझने की कोशिश करते हुए, अनुपस्थित पिताओं के लिए लिखी गयी है ताकि कुछ सच्चाई उजागर हो I 

आइये, आगे और खोजें ...

~~

पिता पुत्र का सेतु-बंधन

अपनी ही आत्मा को खोजता हुआ

खिंचे हुए चेहरे की पेशियों के बीच

जो तरस रही थीं

तनाव मुक्त होने के लिए,

धधकते चेहरे पर

लुढ़कती आंसुओं को पीता हुआ

शोक के बू में नथुने डालता,

भावों का झंझावात दबाये

दिल को मजबूती से पकड़े,

खाली पेट भूख को दर किनार कर

मैं अपने सम्बन्धियों के बीच

पिता की मृत्यु पर आया,

जो उनका सारा स्नेह और दुलार निचोड़ कर

मुझे अकेला कर गया I

मैं सुनसान रेत पर चल रहा हूँ

कि अब क्या कुछ बचा है मेरे लिए

जीवन में कुछ करने के लिए?

~~

अध्याय 1 : पिता और बचपन

माँ का स्नेह पाने के योग्यता की ज़रूरत नहीं, लेकिन

पिता के दुलार के लिए योग्य बनना पड़ता है I

——रोबर्ट फ्रॉस्ट

प्रवेश

माता-पिता, जब कभी हमारे इच्छाओं का विरोध करते हैं, हमें दुःख होता है, फिर भी माता-पिता को खो देना, दुःख ही नहीं, मानसिक अघात देता है I लेकिन यह आघात हम जिस तरह धारण करके संभालते है, उसी तरह की शक्ति से हम सहन भी  कर पाते हैं I इस व्याख्या ने, माता-पिता से जुड़ीं संवेदनाओं में, मेरी कई धारणाओं तथा समझ को बदल दिया है I इसी बदले हुये संवेदनशील धारणा और समझ ने मेरे अंदर सोये हुए जीवांश को झकझोर दिया और मैं  यह पुस्तक लिखने के लिए बाध्य हो गया I मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे विचारों के माध्यम से संवेदना-ग्रस्त तमाम लोगों को मानसिक राहत मिलेगी I

यह हम सब की कहानी है, यह मेरी कहानी है तथा यह कहानी उन बच्चों की है जिनके पिता पृथक हो जाते हैं, अलग हो जाते हैं और बच्चों से दूर रहते हैं I आइये, इस विषय के अंतर में जाकर और अनंत तक पहुँच कर मूलभूत समस्याओं से जुड़ें प्रश्नों का हल ढूँढ़ते हैं I पिताओं और बच्चों के बीच के दूरत्व की पहेली को सुलझाने की कोशिश तो करें I देखें, इस दूरत्व की पहेली को किस तरह टुकड़ों से जोड़ा जा सकता है I हो सकता है कि इतने संवेदनशील पहेली की सारी कड़ियाँ न जुड़ सकें और हम अनुपस्थित (अलग हुये) पिता से बने खालीपन को न भर सकें, लेकिन कभी कभी समाधान खोजना भी समस्या का हल बन जाता है, क्योंकि आशा ढाढस देता है I पिता का अलगाव, किसी एक की ही नहीं बल्कि, समूह की, पीढ़ियों की या देशीय तथा अंतर्देशीय समस्या भी हो सकती है, जो कि न सिर्फ मनुष्यों को बल्कि पशु-पक्षियों को भी प्रभावित करती है I

विश्व की सभ्यता यही कहती है कि महिलायें ही बच्चों की देख-भाल करती हैं I घर की बाकी महिलायें, जैसे दादी, नानी, काकी, बुआ, बहनें आदि का भी बच्चों के पालन पोषण में यथेष्ट योगदान रहता है I आरंभिक दौर में तो नवजात शिशुओं से पुरुषों को दूर ही रखा जाता है जैसे कि वे बच्चे के लिए नर-वानर की तरह खतरनाक हों I संसार की कई जगहों में अभी भी यही चलन है I

फादर्स डे (पिता-दिवस), उन भाग्यशालियों के लिए है, जिनके पिता उनके साथ घुले-मिले रहते हैं I पर लाखों बच्चे और किशोर (वयस्क) ऐसे भी हैं जिनके पिता उनके जीवन में या तो बिलकुल अलग हैं या फिर कभी-कदा मिलते हैं I समय आ गया है कि ऐसे पिताहीन बच्चों में यह भावनाएं जगायी जाएँ कि वे पृथक-पिता दिवस मनाएं I हम इसे ‘अनुपस्थित-पिता जागरण दिवस’ या ‘पिता-हीन जागरण दिवस’ भी कह सकते हैं I यह दिन फादर्स डे के बाद वाले दिन हो तो ठीक है, तब पिता-हीन बच्चे, पुरुष और महिलायें मिल कर अपने अपने अनुभव बाँट सकते हैं I

प्रायः पंद्रह वर्षों पहले, जीवन के घटनाचक्रों से मैं संतापित हो चुका था I और फिर एक दिन मेरे अंदर किसी अनजानी चेतना ने मुझे कविता लिखने के लिए कहा I इस चेतना के आह्वान से मेरी भावनाएं लगातार कविताओं में उतरती रहीं और सौवीं कविता पर जाकर मेरी कलम थमी I कई वर्षों बाद जब मैंने उन कवितों को पढ़ा, मुझे ऐसा लगा जैसे कि ये मेरी कवितायें नहीं हैं I मेरी अन्यतम मानसिक स्थित का सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब, मेरी कविताओं में झलक रहा था I अंततः उन कविताओं को पोएटिक टोर्नेडो (काव्य-झंझा) के नाम से प्रकाशित भी करवाया I बाद में मैंने महसूस किया कि मेरी कवितायें, मेरी भावनाओं का बहाव थीं, जिनको अक्षरों में ढाल कर मैं भावनाओं से रिक्त हो सका था I पिता की मृत्यु के बाद, मेरी इच्छा थी कि उनके स्नेह से वंचित होने पर मैं एक पुस्तक लिखूँ, किन्तु यह पिछले दो साल पहले, मेरी माँ के गुजरने तक नहीं हो सका I उनके बाद ही मैंने, मेरे और साथ रहते हुए भी अनुपस्थित (अलग) मेरे पिता के संबंधों के बारे में लिखा I

हम दोनों के बीच दूरियां लम्बी थीं I रास्ता सूनसान था और आने जाने की गुंजाइश भी नहीं I धूल से भरे रूखी हवाओं को मै महसूस करता रहता जो मेरे कपोलों पर आये आंसुओं को सुखा जाते थे I एक सपने में मैंने उन्हें अपने सोने के कमरे में देखा I चुपचाप, शांत, भाव-हीन खड़े, मुझे ताकते हुए I चेहरे पर भाव न लाना, उन्हें आता था I कमरे में एक असहनीय निस्तब्धता छा गयी थी I लेकिन आज न तो वह खालीपन है और न ही निस्तब्धता I फिर भी धूल के गुबार और कानों में सनसनाती तेज़ हवाएं मुझे परेशान कर रहीं हैं जैसे मेरे मस्तिष्क की धमनियों से निकलना चाहती हैं I यह झंझावात मेरी जान लेने पर तुला है और जब तक अपनी तूफानी भावनाओं को मै शब्दों का रूप नहीं दे देता, तब तक ये मेरी जान पर आमादा रहेंगीं I अतः मैंने इसे लिखने का निर्णय किया है I जितना ही मै इस अनुपस्थित-पिता के भावनात्मक चक्रव्यूह में घुसता हूँ उतना ही अपने जैसे अनेकों को फंसा पाता हूँ I औरों को साथ में  देख कर सहज तो होता हूँ लेकिन पुस्तक पूरी लिखने की प्रेरणा भी मिलती है I

बतख और खरगोश का यह प्रतिष्ठित प्रारूप, जिसे मनोवैज्ञानिक जोसफ जैस्ट्रों ने १८९९ में और दार्शनिक लुडविग ने १९५३ विवेचित किया है, याद दिलाता है कि जब तक कोई अपनी समस्याओं को लिखता नहीं है, उसका ध्यान भटकता रहता है और वह अनिर्णायक हो जाता है I अतः पिता की अनुपस्थिति पर विवरण से लिखने का समय आ गया है, और इस तरह समस्या का जो भी समाधान निकलेगा, मैं सहर्ष स्वीकार करूंगा I 

यूनीसेफ के अनुसार, पिता की अनुपस्थिति इस समय बहुत बड़ी सामाजिक समस्या है I पश्चिमी देशों में, हर रात की तरह, आज की रात भी ४०% बच्चे घरों में अपने पिता की अनुपस्थिति में सोते हैं I जब तक उनकी उम्र १८ वर्ष की होगी, हमारे देश के ५०% से अधिक बच्चों के बचपन का हिस्सा, उनके पिता के बगैर ही बीता हुआ होगा I 

इससे पहले इतने अधिक बच्चों को उनके पिताओं ने कभी छोड़ नहीं दिया होगा I इससे पहले इतनी अधिक तादाद में बच्चों को नही पता होगा कि बिना पिता के कैसे रहा जाय I पिता-हीनता, इस आनेवाली जनसंख्या का सबसे खतरनाक सामाजिक प्रचलन है I डेविड ब्लैंकेन्होरन कहते हैं, यह शक्ति हमारे समाज की समस्या को बहुत जल्दी गंभीर रूप दे रही है (बच्चों और बड़ों दोनों में ) ...अगर यह प्रचलन जारी रहा तो पिता-हीनता हमारे समाज का रूप और रंग बिगाड़ देगी I

पिता को बचपन में ही खो देने से, बच्चों के व्यवहार और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ता है, लेकिन जैविक प्रभावों पर क्या असर पड़ता है, अभी तक ज्ञात नही हो पाया I किन्तु मिचेल के शोध अध्ययन का एक बड़ा दिलचस्प लेख पीड्रियाटिकस पत्रिका के २०१७ के अंक में मुझे पढने को मिला I यह अध्ययन ‘टेलोमीयर’ की लम्बाई से सम्बंधित था I टेलोमीयर क्या होता है? टेलोमीयर मनुष्य की कोशिकाओं के महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं और कोशिका की उम्र पर प्रभाव डालते हैं I हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका के केंद्र में हमारे वंशाणु (जीन्स), डीएनए के अणु में दोहरे धागाओं की तरह बेंत जैसे बंधे होते हैं, जिन्हें क्रोमोसोम्स कहा जाता है I क्रोमोसोम्स के अंत में डीएनए खिचे हुये होते हैं और यह खिंचाव टेलोमीयर कहलाते हैं I टेलोमीयर हमारे अनुवांशिक आंकड़ों (डाटा) की सुरक्षा करते हैं ताकि कोशिकाएं जब विभाजित हों तब हमारी उम्र और कैंसर इत्यादि के गुप्त आंकड़े उनमे बदले नहीं I टेलोमीयर की तुलना जूतों में लगे फीतों के अंत की प्लास्टिक बंधनी से की जाती है क्योंकि ये भी क्रोमोसोम्स की लड़ियों को आपस में चिपकने या अंत में बिखरने से रोकते हैं I यदि टेलोमीयर नष्ट हुए तो जीवधारी के अनुवांशिक आंकड़े या तो नष्ट हो सकते हैं या बिखर सकते हैं I तथापि, कोशिकाओं के विभाजित होने पर टेलोमीयर छोटे हो जाते हैं और इस तरह कई विभाजन के बाद जब कोशिकाएं और विभाजित नहीं हो पातीं, टेलोमीयर, निष्क्रिय या यों कहें कि बूढ़े हो जाते हैं और मर जाते हैं I टेलोमीयर के छोटे होते रहने की यह प्रक्रिया, लोगों के उम्र, कैंसर तथा मृत्यु की विपदाओं से जुड़ी होती हैI

शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पिता के स्नेह से वंचित (पिता की मृत्यु, तलाक़ या जेल जाने के कारण)  व्यक्तियों के टेलोमीयर की माप से अनुमानित, कोशिकाओं के छोटे होने की प्रक्रियाओं का परीक्षण किया है I अमेरिका के २० बड़े शहरों से ऐसे  तमाम बच्चों के आंकड़े, ९ वर्षों तक निगरानी में रखे गए, जिनके पारिवारिक सम्बन्ध कमजोर थे I निगरानी में उनके पालन पोषण की व्यवस्था को भी ध्यान में रखा गया I लारमय ग्रंथियों (सैलाविरी ग्लैंड) की माप ली गयी, पिता के खोने की मूल रिपोर्ट ली गयी और वन्शाणु से सम्बंधित सेरोटोनेर्जिक एवं डोपमिनेर्जिक बदलाव की रिपोर्टें भी ली गयीं I नतीजों से पता चला कि ९ वर्ष के होते होते, पिता-हीन बच्चों के टेलोमीयर की माप में महत्वपूर्ण रूप से कमी आयी है I पिता की मृत्यु का असर सबसे अधिक (१६% कमी) था I पिता के जेल जाने का असर उससे कम (10%) और तलाक़ का उससे कम (६%) रहा है I लड़कों में ये असर ४०% अधिक रहे हैं I पिता के खोने का असर उम्र, जाति और नस्ल से परे है I इस अध्ययन का निष्कर्ष यह निकला कि पिता के खोने का असर बच्चों के ‘एसटीएल’ पर महत्वपूर्ण तरीके से पड़ता है, जिसमे पिता की मृत्यु का सबसे अधिक असर होता है I इससे यह प्रमाणित होता है कि बच्चों की देख भाल और विकास में, पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है तथा माता या पिता के क़ैदी हो जाने पर बच्चों में नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है I

मेरा परिवार, लगातार दुर्भिक्ष से पीड़ित, एक छोटे कसबे में रहता था I पानी की कमी, सीमित बिजली और मच्छरों की फ़ौज के हम आदी हो चुके थे I दो दो वर्षों के अंतर से, हम पांच बच्चों का तेज़ी से बढ़ता हुआ परिवार था I बहुत मेहनत मशक्कत करने बाद भी मेरे माता-पिता हमारी बढ़ती हुयी ज़रूरतों को पूरा नहीं कर पाते थे I यद्यपि मेरे पिता हमारी ज़रूरतें पूरा करने के लिए जी तोड़ मेहनत करते, फिर भी हमारी माँ ने, जो थोड़ा धनी परिवार से थीं, कभी मुझे गरीबी का एहसास नहीं होने दिया I अतः मैंने हमेशा सम्पन्न महसूस किया I पाँचों बच्चों में मैं बीच का हूँ, दो बहने बड़ी, एक भाई छोटा और एक बहन छोटी I मैंने ऐसा सुना है कि परिवार की रेलगाड़ी में कोई दिक्कत होने पर सबसे पहले और सबसे आखिरी डिब्बे को ही झेलना पड़ता है I मेरी सबसे बड़ी बहन छोटे सिर की थी जिसे डाक्टरी भाषा में ‘माइक्रोसिफैली’ कहा जाता है और सबसे छोटी बहन परिवार की एक अप्रत्याशित सदस्या थी I शायद अनवांछित किन्तु परिवार की जान I 

मेरे बचपन का प्रथम पर्व बीमारियों से ग्रस्त था I ‘मीज़ल्स’ ने तो करीब करीब मेरी जान ही ले ली थी I डॉक्टर ने तो मेरी माँ को यहाँ तक कह दिया था कि घर ले जाइए और दुआएं करिए I मेरा चेहरा लाल दानों से सुर्ख हो गया था, फिर भी मैं बच गया I मेरी माँ गर्वान्वित थीं कि मै बच गया था I उसके बाद मेरी बीमारियों को मुझे याद कराके, स्वस्थ रहने की वे मुझे हिदायत देती रहीं और फिर कभी मै बीमार नही पडा I ये वह दिन थे जब मीज़ल्स के टीके नही होते थे I प्रतिरक्षित समुदाय (हेर्ड इम्युनिटी) के बीच में रहकर ही बीमारी का निदान किया जा सकता था I अतः संक्रमित बच्चों को लेकर लोग पड़ोसियों के यहाँ जाते थे ताकि प्रतिरक्षित समुदाय का एक हिस्सा बन कर बच्चे में बीमारी को और बढ़ने से रोका जा सके ! मैं ज़रूर ‘एडीएचडी’ बच्चा रहा होऊंगा, यानी चंचल और छटपट और मुझे संभालने में मेरी माँ को बहुत दिक्कत हुयी होगी I मेरी माँ कहती थीं कि मै बहुत हठी था और किसी भी चीज़ को पाने के लिए खच्चर की तरह जिद करता था I मुझे हल्का सा याद है कि एक बार सिनेमा से लौटते समय किसी चीज़ को खरीदने के लिए मैंने अपनी माँ के बाल तक खींच लिए थे I मेरी माँ कहती थीं कि मेरी जिद ही जीवन में

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