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बाज़

परशुराम शमाा
यूं तो बचपन की बातें अक्सर याद नहीूं रहती – हालााँ कक वह बातें बडीी़ कदलकश हुआ करती हैं !
कवनी को भी बचपन कीबातें याद न आती थी पर चूंद बातें ऐसी अवश्य हैं किन्हें भुलाया नही िा
सकता !
कवनी ने िब होश सम्भाला था तो एक साफ – सुथरे छोटे - से मकान में था, िहााँ एक
अधेड़ आयु की औरत उसकी दे खभाल करती थी ! वह औरत प्रकतकदन उसे एक कनकित समय पर
िगाती, नहलाती – कपड़े बदलती, ठीक समय पर पौकिक चीिें खाने में दे ती – शाम को उसे
पढाती और कफर कनकित समय पर उसे सुला दे ती !
उसने तब तक बाहर की दु कनया नहीूं दे खी थी....इसकलये उसे नहीूं मालम था कक दु सरे
लोग ककस तरह किन्दगी गुिारते हैं – कफर भी अपनी कमकसन उम्र के बाविद उसे न िाने क्ोूं ऐसा
लगता िै से वह एक मशीन है – किसके कभन्न-कभन्न बटन कभन्न-कभन्न समय में वह औरत दबा दे ती है
ताकक वह अपना काम अूंिाम दे सके ! उसी औरत ने कवनी को बातें करना कसखाई थी ! उसी
औरत ने उसे बताया कक वह उसकी गवनें स है !
लगभग प्रत्येक सप्ताह लम्बे कद की बहुत ही सुूंदर स्त्री अूंधेरा फैलते ही वहाूं आया करती
थी ! आते ही योूं बेकरारी से कवनी को सीने से कचपटा ले ती – िै से कवनी उसका कोई खोया हुआ
खखलौना था िो मु द्दत के बाद उसे कमल है ! स्त्री उसे बेटा कहकर पुकारती थी – बेतहाशा चमती
और कभी-कभी तो कवनी को चमते वक़्त उसके आूं स बहने लगते !
कवनी िब छोटा था तो उसे मालम नहीूं था कक बेटा ककसे कहते हैं .....ले ककन ज्ोूं-ज्ोूं
गवने स की दी हुई कशक्षा के साथ-साथ उसकी उम्र बढ़ती गई तो उसे दु कनया की बहुत-सी बातोूं का
इल्म होने लगा ! तब उसे यह भी ज्ञात होूं गया कक मााँ की ममता क्ा चीि होती हैी़ और क्ोूं वह
अपने बेटे को इतना प्यार करती है ! उसके कदल में भी माूं प्यार िाग उठा…. अब वह स्त्री िब भी
आती, उसे सीने से लगाती तो उसे बड़ा सकन कमलता िै से कोई मु साकफर तपती दोपहर में ककसी
दरख़्त की छाूं व में सकन प्राप्त करता है !
कवनी बेकरारी से अपनी माूं का इन्तिार ककया करता और सप्ताह के उस कदन तो उसकी आूं खे
सुबह से ही गेट पर लगी रहती....हालााँ कक वह िानता था कक उसकी माूं कदन में कभी नहीूं आती
- ! गवने स की कशक्षा-दीक्षा के अलावा भी उसके इूं सानी कदल ने उसे बता कदया था कक माूं क्ा
चीि होती है ....अन्यथा पहले तो वह उसे दर दे श में बसने वाली कोई परी ही लगती थी, किसकी
कहाकनयााँ कभी कभार उसकी गवने स सुनाया करती थी ! िब उसे यह मालम हो गया कक माूं ककसे
कहते हैं तो उसका कदल भी माूं के साथ रहने को मचलने को लगा !
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! यह बचपन की बहुत कच्ची उम्र थी....िब उसने पहली बार अपनी माूं के गले में बाहें डाल कर
कहा था-iiमम्मी ! आप मु झे अपने साथ क्ोूं नहीूं ले िाती ? क्ा मैं आपको अच्छा नही लगता –
िो आप मु झे अपने साथ नहीूं रखती ?
उस वक़्त कवनी क़ो नहीूं मालम था कक उसकी माूं के कूंठ से ऐसे सवाल पर िो आवाि
कनकली थी उसे कससकी कहते हैं ! तब माूं ने पहले से कहीूं अकधक िोश से उसे सीने से कचपटा
कलया था – आूं स उसकी नीली-नीली कबल्लौरी आाँ खोूं से योूं उमड पडे थे , िै से मु द्दतोूं से िमीद
ूं ोि

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मचलता हुआ कोई चश्मा ककसी गोशे को कमिोर पाकर फट पदा हो ! कवनी ने इस बुरी तरह पहले
कभी मम्मी को रोते नहीूं दे खा था ! वह डर गया – कक शायद उसने कोई अनु कचत बात कह दी है
किससे मम्मी को सदमा हुआ है !
आई एम सोरी मम्मी ! उसने डरते हुए कहा !
मम्मी िो सफेद रे शमी शाल परे किस्म पर लपेट कर आया करती थी...उसने पल्ल से आूं स
पोूंछे और कवनी को सीने से लगाकर बोली-अभी समय नहीूं आया है बेटे ! तुम्हें क्ा पता कक तुम्हारी
मम्मी तुमसे दर रहकर ककस तरह की किूं दगी गुिार रही है -लेककन अभी समय नहीूं आया-समय नहीूं
आया
आखखर मम्मी का स्वर भराा ता हुआ िै से कूंठ मे ही घुट कर रह गया-उनकी निरें कवनी के चेहरे
पर नहीूं थी और उनकी लम्बी-लम्बी पलकें यूं सशूंककत हो गई थी िै से वह कोई दहशतनाक ख्वाब
दे ख रही होूं, कफर उन्होने चौूंककर घड़ी दे खी-शाल इस तरह अपने शरीर पर सावधानी से लपेटी कक
उनके लम्बे घने रे काले बाल और आधा चेहरा भी उसमें कछप गया और वह िाने के कलये तैयार हो
गई !
उनके िाते समय गवने स मे ररया कवनी को कमरे में रोक ले ती थी ले ककन उस रोि शायद वह
ककचन में थी ! अत: िब मम्मी उसे प्यार करके बाहर चली गई तो वह भी चुपके-चुपके उनके
पीछे चल कदया-बरामदे में उतरकर गेट के कनकट पहुूं चा तोूं उसने दे खा – उसकी मम्मी एक सुरमई
रूं ग की बडीी़ सी कार में बैठ रही थी, किसकी डराइकवूंग सीट पर कोई ‘कैप’ वाला आदमी बैठा था
!
चलो डराइवर ! उसने मम्मी की आवाि सुनी !
उसका कदल चाहा कक दौड़कर वह मम्मी के साथ बैठ िाये और अगर मम्मी उसे न कबठाये तो
खखड़की पर लटक िाये….कफर तो शायद तरस खाकर मम्मी उसे कबठा ही ले गी – ले ककन ठीक उसी
समय बाबा चन्दन की निर उस पर पड़ गई िो मम्मी के िाने के बाद गेट बूंद कर रहा था ! वह
एकदम से कठठका कफर सहमता हुआ – सा एकदम से कवनी की तरफ लपका िै से कवनी ककसी गढ् ढे
के दहाने पर आ पहुूं चा हो और अब उसमें कगरने ही वाला हो ! उसने तुरन्त फुती से कवनी को गोद
में उठाया और अूंदर को दौड़ा ! अूंदर से गवने स मे ररया उसकी तलाश में लपकी आ रही थी !
बाबा चन्दन ने उसे मे ररया के हवाले ककया और उसे डाूं टने लगा कक वह बच्चे का ख्याल नहीूं रखती
!
यह थी कवनी के बचपन की शु रुआत.....एक ऐसे इूं सान का बचपन िो आगे चलकर सारी
किन्दगी आग के शोलोूं में गुिरता रहा था और मौत को हमकबस्तर बनाकर सोता रहा !
बाबा चन्दन कोई बढा आदमी नहीूं था....उसके कसर के चूंद ही बाल सफेद थे ! ले ककन न िाने
क्ोूं बाबा कहा िाता था – हालाूं कक वह इतना ऊाँचा-लम्बा-तगड़ा और ताकतवर आदमी था कक कई
बार बाग में काम करते समय कवनी ने उसे वृक्षोूं की मोटी-मोटी शाखे एक हाथ से यूं तोड़-मरोड़
कर वृक्ष से छूं टाई
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करते दे खा था िै से वह महि झाड़ के कतनके होूं !


कवनी नहीूं िानता था कक बाबा चन्दन कौन हैं ! उस घर म ूं ककसकलये रह रहा है और उसका
वास्तकवक काम क्ा है ! कभी वह बाग को सिाता-सूंवारता नी़िर आता था – कभी मकान में
मरम्मत वगैरा की िरूरत पेश आती तो वह भी उसके हाथोूं होती ! बािार से सौदा वही लाता था
और एक बार तो कवनी ने उसे बाग में एक गढ्ढा खोदकर पुख्ता तालाब भी बनाते दे खा था ! ऐसा
मालम होता था कक उसे दु कनया का हर काम आता है ! खाली समय में वह गेट के कनकट दीवार
की आड़ में एक गद्दे दार कुसी पर बैठा रहता था ! आमतौर पर वह मात्र धोती और वास्केट पहनें

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रहता था ! वास्केट के बटन अक्सर खु ले ही रहते थे और बालोूं से भरा उसका चौड़ा-चकला स्याह
सीना दे ख कवनी को रीछ का गुमान होता था किसकी तस्वीर उसने अपनी एक अूंग्रेिी की ककताब में
दे खी थी !
बाबा चन्दन का शायद सबसे बड़ा कताव्य कवनी को घर से बाहर िाने से रोकना था ! कवनी घर
से बाहर िाने के कलए बहुत किद्द करता तो कभी-कभी वह उसे अपने साथ शाम के अूंधेरे में
फुटपाथ पर चहल-कदमी कराने ले िाता या उसे पाका में घुमाने ले िाता िो घर से कुछ ही फासले
पर था !
इस तरह कवनी अपने आस-पास के वातावरण से थोड़ा बहुत पररकचत हो गया था ! उसने दे खा कक
उनके इदा -कगदा मकानो की कुछ कतारें थीूं िो लगभग उसी प्रकार के थे ! तकरीबन सभी में
कम्पाउूं ड लॉन या बाग़ थे ! उनके घरोूं के रहने वालोूं को अपने अड़ोस-पड़ोस से कतई कोई
कदल्चस्पी नहीूं थी ! कवनी ने वहाूं कभी अकधक चहल-पहल नहीूं दे खी थीूं ! इसी तरह की परवररश
का पररणाम था कक िब पाूं च साल के बच्चे कवनी को स्कल में दाखखल कराने ले िाया गया तो उसे
यह भी ज्ञात नहीूं था कक कौन-से शहर में रह रहा है ! अलबत्ता कप्रूंकसपल के कहने पर एक टीचर
ने उसकी िो मौखखक परीक्षा ली उसमें कवनी ने झट-पट िवाब कदए या चूंद कमनटोूं में कलख कदए
क्ोूंकक वह सब गवने स मे ररया उसे अच्छी तरह पढ़ा चुकी थी ! कप्रूंकसपल ने ख़ु शी से कवनी को
दाखखल कर कलया और कवनी की किूं दगी िै से इूं कलाब की सीकढ़याूं चढ़ने लगी ! उसे दसरे बच्चोूं के
साथ बोलने ,खेलने -कदने , पढ़ने का अवसर कमला तो बड़ा खु श रहने लगा ! ककन्तु गवने स मे ररया की
उसे सख्ती से कहदायत थी कक वह क्लास में ककसी लड़की या लड़के से अकधक दोस्ती ना बढ़ाए और
घर पर तो ककसी को हरकगि इन्वाइट ना करे - न ही ककसी के घर दावत पर िाये !
बाबा चन्दन उसे एक छोटी - सी कर में स्कल छोड़ के िाता और छु ट्टी के वक्त ले ने आता
और तब कवनी को मालम हुआ कक बाबा कार चलानी भी िानता था और वह कार अब घर पर ही
रहती थी ! मम्मी ने उसके स्कल में एडमीशन से चूंद रोि पहले ही वह कार कभिवाई थी ! अब
िब भी कवनी की मम्मी कमलने आती तो गवने स से िरूर पछ ले ती कक उसकी कशक्षा ररपोटा बुक
कैसी है और यह सुनकर उन्हें बड़ी खु शी होती की कवनी हर क्षे त्र में प्रथम आ रहा है ! गवने स
मे ररया उसे इतनी अच्छी तरह पढ़ाती कक स्कल में पढाई पर ध्यान दे ने की तो उसे आवश्यकता भी
महसस न होती थीूं ! इसी तरह िीवन की सीकढ़याूं चढ़ते हुए कवनी अपने िीवन की आठवीूं सीढ़ी
चढ़ चुका था ! अब उस पर कुछ पररश्रम का बोझ आन पड़ा था ! बाबा चन्दन ने बाग के एक
क्षे त्र में िो इमली के वृक्षोूं से कघरा हुआ था, एक अखाडा खु दवा रखा था किसमें वह सुबह से शाम
तक अिीबोूं गरीब वकिा श और उछलकद ककया करता था
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कवनी को हुक्म कमला कक वह भी दोनोूं समय अखाड़े में लूं गोट कसकर हाकिरी कदया करे ! शु रू-
शु रू में उसे बड़ी कोफ्त हुई और एक बार उसने मम्मी से कशकायत भी की कक उसे सुबह-शाम
कमटटी में लोट लगाना और हाथापाई करना कबलकुल पसूंद नहीूं, परन्तु मम्मी ने उसे चमते हुए बड़े
प्यार से समझाया -
बेटा ! वह तुम्हारे भले के कलए सब-कुछ कर रहा है - वह तुम्हें पहलवानी - योगा और गुत्का
कसखायेंगे...तुम खब लम्बे-तगड़े और ताकतवर बन िाओगे ! इसके अलावा भी तुम्हें किन्दगी में
बहुत-कुछ सीखना है ! तुम्हें नहीूं मालम बेटा कक इस दु कनया में कमिोरी और इज़्ज़त एक साथ नहीूं
चल सकता ! कमिोर आदमी का इज़्ज़त के साथ िीवन गुिारना बहुत मु खिल है , क्ोूंकक यह
उसल तो कुदरत ने ही बनाया है कक बड़ी मछली छोटी मछली को कनगल िाती है ...मैं चाहती हाँ
कक तुम ताकतवर बनो...बड़ी मछली बनो ताकक तुम्हें कोई न कनगल सके !

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मम्मी का ले क्चर तो समझ में नहीूं आया था परन्तु इस अखाड़े बािी के कनरन्तर व्यायाम के बाद
उसे कुछ ही कदनोूं में खु द ही आनन्द प्राप्त होने लगा था ! अखाड़े की कमटटी की सोूंधी-सोूंधी खु शब
के साथ िब उसके पसीने की बूंदोूं का कमलन होता तो उस पर एक सरूर-सा छ िाता !
बाबा चन्दन से रोि नए करतब सीखने में उसे उतना ही आनूं द प्राप्त होता कितना स्कल में हर
रोि कमस शीला का लेक्चर सुनने से प्राप्त होता था ! बाबा चन्दन सुबह-सुबह उसे योग-अभ्यास
कराता....शाम को रोि व्यायाम कराता और दाूं व-पेंच कसखाता ! उसकी खु राक भी बाबा की
कहदायत के अनु सार तैयार के िाती थी !
िब कवनी दस साल की उम्र में पहुूं चा तो उसे अपने शरीर में कई पररवतानोूं का अहसास हो
गया था ! पना का कैथोकडरल स्कल, िहााँ वह कशक्षा प्राप्त कर रहा था, उस दौर का सबसे महूं गा
और ऊाँचा स्कल था ! उसमें साहकारोूं और बड़े -बड़े आकफसरोूं के बच्चे पढ़ते थे और इक्का-दु क्का
को छोड़ कर सभी सेहतमूं द और तूंदुरुस्त थे ....परन्तु कवनी उन सबमें सबसे अलग ही निर आता
था ! उसका स्वास्थ्य और शखक्त उनसे कई गुना पु ि थी ! अपनी शखक्त का अहसास कवनी को स्कल
की एक घटना से हुआ !
वैसे तो कैथोकडरल स्कल की अपनी एक अलग ही दु कनया थी िहााँ बच्चोूं को कसफा पुस्तकोूं की
कशक्षा ही नहीूं दी िाती थी बखि उन्हें ....समाि के आदाब....बातचीत का सलीका और समाि
की धाकमा क रूपरे खा की तमाम बातें कसखाई िाती थीूं ! और पाूं चवीूं क्लास में पहुूं चते-पहुाँ चते यहााँ के
बच्चे िे हनी तौर पर बड़ोूं से भी अकधक कशकक्षत बन िाते थे ! ले ककन यह भी शायद कुदरत का ही
उसल है कक िहााँ पर बहुत-सी-अच्छाइयाूं होूं वहाूं एक-आध बुराई भी िन्म लेती है !
उसकी क्लास में पवन एक बुराई िै सी ही चीि का नाम था ! वह एक कडप्टी कलेक्टर का बेटा
था और एक आूं ख से भें गा था ! सभी बच्चोूं को सबक कदया गया था ककसी की शारीररक बनावट का
उपहास उड़ाना पाप है इसकलए पवन को कभी ककसी ने भें गा कहकर नहीूं छे ड़ा था लेककन खु द
उसमें एक रूं ग ज्ादा ही था ! वह हर ककसी के साथ कोई-ना-कोई शरारत करता रहता था कफर
भी क्लास रूम में वह गूंभीर ही रहता था, अलबत्ता बाहर ग्राउूं ड पर वह अपनी शरारतोूं को उिागर
करता रहता था ! ककसी का लूं च बॉक्स छीन ले ना, ककसी की टाई की कगरह कस दे ना-चुपके से ब्लेड
से ककसी का कोट काट डालना, और की बहुत-सी हरकतें उसकी कनत्य किया थीूं ! उसकी कशकायतें
भी अक्सर कमस शीला तक पहुाँ चती रहती थीूं िो उनकी क्लास टीचर थीूं ! उस पर फाइन ककया
िाता, उसके कपता को कशकायतें िातीूं-उत्तर
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में क्षमा पत्र आ िाता


उस रोि पवन का शरारती पूंिा कवनी की तरफ भी बढ़ा और उसने प्ले ग्राउूं ड में कवनी के करीब
से गुिरते वक़्त फाउूं टेन पैन से उस पर स्याही कछडकी ! उसकी सफेद कमीि पर बड़े -बड़े नीले
धब्बे पड़ गए ! उसकी तरफ दे खते हुए कवनी ने अपने चेहरे पर हाथ फेरा िहाूं उसे नमी का
एहसास हुआ था ! उसका हाथ भी स्याही में कलथड़ गया यानी स्याही उसके चेहरे पर भी फ़ैल चुकी
थीूं !
उसे अपने चेहरे पर बड़ा नाि था और उस पर ककसी ककस्म की धल तक बदाा श्त न कर
सकता था, कफर उस समय तो क्लास की लड़ककयाूं -लड़के तमाम कडकसखप्लन को ताक पर रख कर
उसके चेहरे को दे खकर हूं स रहे थे ! पवन उसकी तरफ पीठ ककये इत्मीनान से िा रहा था िै से
उसने कुछ ककया ही नहीूं ! कवनी लम्बे -लम्बे डग भरता हुआ उसके कनकट पहुूं चा ! उसे कॉलर से
पकड़कर कवनी ने एक झटके से अपनी तरफ खीूंचा और उसके मुाँ ह पर एक घूंसा रसीद कर कदया !
वह मुाँ ह पर हाथ रखकर चीखता हुआ पलटकर घास पर िा कगरा ! कवनी ने इसी पर उसे माफ़ नहीूं

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ककया...झुककर उसे कगरे बान और बैल्ट से पकड़कर उठाया और कसर से ऊूंचा करके घास पर
पटक कदया-पवन वहीूं खथथर हो गया िहाूं कवनी ने उसे पटका था !
कमस किस्टीना, िो एक अूंग्रेि युवती थी और उनकी अूंग्रेिी की क्लास ने त्री थी, ग्राउूं ड से
गुिरते समय यह दृश्य दे ख रही थी ! वह बौखलाई हुई दौड़ी-दौड़ी आई पहले तो कमस किस्टीना ने
आिया और भय से फटी-फटी आूं खोूं से कवनी की तरफ दे खा िै से वह कोई लड़का नहीूं अिबा हो
!
इतने मोटे लड़के को तुमने योूं उठाकर पटक कदया ? कमस किस्टीना ने अूंग्रेिी में कहा ! कवनी
नहीूं समझ सका कक यह उनके गुस्से का इिहार था या आिया का !
'यस मै डम ! कवनी ने िवाब कदया और अपनी कमीि तथा चेहरे की ओर सूंकेत ककया-िरा
दे खखये तो इसने क्ा हरकत की थी !
'तुम्हें कमस शीला से कशकायत करनी चाकहये थी ! वह अब भी कवनी को उसी दृकि से घर रही
थी !
'इससे पहले भी कई क्लास फैलोि ओर िकनयसा ने इसकी कशकायतें की हैं मगर यह कभी बाि
नहीूं आया था ! अब शायद आ िाए !
कवनी को स्वयूं भी हैरत थी कक उसके मुाँ ह से ऐसा तुकी-ब-तुकी िवाब ककस तरह कनकला !
कमस किस्टीना झुककर उसकी कमीि दे खने लगी ओर कफर कवनी वहाूं से क्लास रूम में चला गया !
कुछ दे र बाद उसने एम्बु लेंस की आवाि सुनी ओर कुछ क्षणोूं बाद ही क्लास शु रू होने की बैल बि
गयी ओर सब बच्चे क्लास में आ गये ! सबके सब चुप थे और अिीब निर से कवनी को दे ख रहे थे
!
कमस शीला क्लास रूम में आई और उन्होूंने कवनी को आदे श कदया कक कफलहाल वह अपना बैग
उठाकर ले िाये और कप्रूंकसपल के दफ्तर में बैठे ! िब कप्रूंकसपल उसे दु बारा अनु मकत दें गे तो वह
क्लास रूम में आ सकता है ! कवनी कप्रूंकसपल के दफ्तर में पहुूं चा तो उन्होूंने ऐनक के मोटे -मोटे
शीशोूं के पीछे से उसे दे खा और एक कोने में खड़े होने का हुक्म दे कर अपने में व्यस्त हो गये !
कवनी भी दे र तक बुत्त बना कोने में खड़ा रहा ! अन्त में टे लीफोन कक घूंटी ने सन्नाटा तोडा !
कप्रूंकसपल चन्द क्षणोूं तक दसरी तरफ की बातें सुनते रहे कफर बोले -अच्छा...बहरहाल यह तो
यकीन है कक चार-पाूं च रोि बाद ठीक हो िायेगा-कचन्ता की कोई बात नहीूं है ! केवल चन्द क्षण
दसरी तरफ से
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बचपन की इन उचटती झलककयोूं के अलावा एक कदन और उसके िीवन की यादोूं में नश्तर चुभोता
है -उस रोि वह अपने कमरे में खखड़की के करीब छोटी-सी मे ि पर बैठा अपना होमवका कर रहा
था ! शाम का धुूंधलका फैल चुका था ! उसने टे बल लैम्प िलाया और चन्द लम्हें सुस्ताने की गरि
से कुसी के पुश्त से टे क लगाकर बैठ गया ! सुबह बाररश हो चुकी थी और कफ़िा में एक कवकचत्र-
सी सोूंधी-सोूंधी खुश्ब फैली हुई थी ! बाग में खड़े हुए इमली और आम के दरख्तोूं के दरम्यान हवा
धीरे -धीरे सरसरा रही थी ! एकाएक हवा का एक तेि झोूंका आया ! वृक्षोूं की शाखें लहराई और

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तालाब के करीब खड़े एक वृक्ष से आम टट कर एक तालाब में कगरा ! मलगिे अूंधेरे में कवनी ने
उसे पानी में गायब होते दे खा ! उसने वनस्पकत कवज्ञान की एक पुस्तक में पढ़ा था कक पौधे और वृक्ष
िानदार होते है और साूं स भी ले ते हैं -फका कसफा इतना है कक वह कदन में ऑक्सीिन की बिाय
काबान डाईआक्साइड िज्ब करते हैं और ऑक्सीिन छोड़ते हैं ! वह सोच रहा था कक यकद वृक्ष
िानदार होते हैं तो क्ा कनिय ही उनकी सूंताने होती होूंगी और वृक्ष से िु दा होने के बाद कनिय ही
उन्हें मौत आ िाती होगी ! खाली समय में ऐसी ही उल्टी सीधी बातें उसके िे हन में बार-बार आती
थीूं-वह िो कुछ पढता था उससे आगे की सोचता रहता था !

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