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पा तःस मरणीय पू जयपाद

संत शी आसारा मजी बाप ू के


सतस ंग पव चन
पुरषाथ थ परम द ेव
अनु कम
अधयातम के उदगाता। हे नरी कैझर।
पुरषाथथ परमदे व। नेपोिलयन बोनापाटथ ।
पुरषाथथ कया है ? उससे कया पाना है ? रणजीत िसंह।
संकलपबल के िसतारे – महाकिव कािलदास िवनोबा भावे।
वेिलंगटन।

अधय ातम के उ दगा ता


पूजयपाद संत शी आसाराम जी बापू आज समग िवश की चेतना के साथ एकातमकता
साधे हुए ऐसे बहजानी महापुरष है िक िजनके बारे मे कुछ िलखना कलम को शमान
थ े जैसा है ।
पूजयशी के िलए यह कहना िक उनका जनम िसनध के नवाब िजले के बेराणी नामक गाँव ई. श.
1941 मे िव. सं. 1998 चत वद 6 को हुआ था, यह कहना िक उनके िपताशी बडे जमींदार थे, यह
कहना िक उनहोने बचपन से ही साधना शुर की थी और करीब तेईस साल की उम मे
आतमसाकातकार िकया था- यह सब अपने मन को फुसलाने वाले कहािनयाँ है । उनके िवषय मे
कुछ भी कहना बहुत जयादती है । मौन ही यहाँ परम भाषण है । सारे िवश की चेतना के साथ
िजनकी एकतानता है उनको भला िकस रीित से सथूल समबनधो और पिरवतन
थ शील िकयाओं के
साथ बाँधा जाये?
आज अमदावाद से करीब तीन-चार िक.मी. उतर मे पिवत सिलला साबरमती के िकनारे
तथा सूरत शहर से तीन-चार िक.मी. उतर मे सूयप
थ ुती तापी के तट पर, ऋिष-मुिनयो की तपोभूिम
मे धवल वसधारी परम पूजयपाद संतशी लाखो-लाखो मनुषयो के जीवनरथ के पथ पदशक
थ बने
हुए है । कुछ ही साल पहले साबरमती की जो कोतरे डरावनी और भयावह थीं, आज वही भूिम
लाखो लोगो के िलए परम आशय और आननददाता तीथभ
थ ूिम बन चुकी है । हर रिववार और
बुधवार क िदन हजारो लोग अमदावाद तथा सूरत के आशम मे आकर मसत संतशी के
मुखारिवनद से िनसत
ृ अमत
ृ वषाथ का लाभ पाते है । धयान और सतसंग का अमत
ृ मय पसाद पाते
है । बाद मे पूजयशी की पावन कुटीर के सामने िसथत, मनोकामनाओं को िसद करने वाले
कलपवक
ृ बड बादशाह की पिरकमा करते है । एक सपाह के िलए एक अदमय उतसाह और आननद
भीतर भरकर लौट जाते है ।
कुछ साधक पूजय शी के पावन सािननधय मे आतमोतथान की ओर अगसर होते हुए
सथायी रप से आशम मे ही रहते है । इस आशम से थोडी ही दरूी पर िसथत मिहला आशम मे
पूजय माता जी की िनगाहो मे रहकर कुछ सािधकाएँ आतमोतथान के मागथ पर चल रही है ।
अमदावाद और सूरत के अलावा िदलली, आगरा, वनृदावन, ऋिषकेश, इनदौर, भोपाल, उजजैन,
रतलाम, जयपुर, पुषकर, अजमेर, जोधपुर, आमेट, सुमेरपुर, सागवाडा, राजकोट, भावनगर, िहममतनगर,
िवसनगर, लुणावाडा, वलसाढ, वापी, उलहासनगर, औरं गाबाद, पकाशा, नािसक एवं छोटे मोटे कई
सथानो मे भी मनोरमय आशम बन चुके है और लाखो लाखो लोग उनसे लाभािनवत हो रहे है ।
हर साल इन आशमो मे मुखय चार धयान योग साधना िशिवर होते है । दे श िवदे श के कई साधक
सािधकाएँ इन िशिवरो मे सिममिलत होकर आधयाितमक साधना के राजमागथ पर चल रहे है ।
उनकी संखया िदनोिदन िवशाल हो रही है । पूजयशी का पेम, आननद, उतसाह और आशासन से
भरा पेरक मागद
थ शन
थ एवं सनेहपूणथ सािननधय उनके जीवन को पुलिकत कर रहा है ।
िकसी को पूजयशी की िकताब िमल जाती है , िकसी को पूजयशी के पवचन की टोप सुनने
को िमल जाती है , िकसी को टी.वी. एवं चैनलो पर पूजयशी का दशन
थ सतसंग िमल जाता है , िकसी
को पूजयशी का आितमक पेम पाकर अननत िवशचेतना के साथ तार जोडने की सदभागी हो
जाता है । वह भी आधयाितमक साधना का मागथ खुल जाने से आननद से भर जाता है पूजय शी
कहते है - "तुम अपने को दीन हीन कभी मत समझो। तुम आतमसवरप से संसार की सबसे बडी
सता हो। तुमहारे पैरो तले सूयथ और चनद सिहत हजारो पिृिवयाँ दबी हुई है । तुमहे अपने
वािसतवक सवरप मे जागने मात की दे र है । अपने जीवन को संयम-िनयम और िववेक-वैरागय से
भरकर आतमािभमुख बनाओ। िकसने तुमहे दीन-हीन बनाये रखा है ? िकसने तुमहे अजानी और
मूढ बनाये रखा है ? मानयताओं ने ही न? तो छोड दो उन दःुखद मानयताओं को जाग जाओ अपने
सवरप मे। आपको मात जागना है ... बस। इतना ही काफी है । आपके तीव पुरषाथथ और सदगुर के
कृ पा-पसाद से वह कायथ िसद हो जाता है ।"
शी योग व ेदानत स ेवा स िम ित
अमदावाद आ शम
(अनुकम)

पुरषाथ थ परमद ेव
शी विशष जी महाराज पुरषाथथ की मिहमा सुनाते हुए शी राम चनद जी से कह रहे है -
"हे मननकताओ
थ ं मे शष
े शी राम ! जो जीव सतसंग करता है और सतशास को भी
िवचारता है िफर भी पकी के समान संसार वक
ृ की ओर उडता है तो समझो उसका पूवथ का
संसकार बली है । इसिलए वह आतमजान मे िसथर नहीं हो सकता। यदिप पूव थ के संसका अनयथा
नहीं होते िफर भी जीव सतसंग करे और सतशास का दढ अभयास करे तो पूवथ के बली संसकार
को भी वह पुरष पयत से जीत लेता है । पूवथ के संसकार से दषुकृ त िकया ऐ और सुकृत करे तो
िपछले का अभाव हो जाता है । यह पुरष पयत से ही होता है ।
(अनुकम)

पुरषाथ थ क या ह ै ? उसस े क या पाना ह ै ?


जानवान जो संत है और सतशास जो बहिवदा है उसके अनुसार पयत करने का नाम
पुरषाथथ है और पुरषाथथ से पाने योगय आतमजान है िजससे जीव संसार समुद से पार होता है ।
हे राम जी! जो कुछ िसद होता है वह अपने पुरषाथथ से ही िसद होता है । दस
ू रा कोई दै व
नहीं। जो लोग कहते है िक दै व करे गा, सो होगा, यह मूखत
थ ा है । िजस अथथ के िलए दढ संकलप के
साथ पुरषाथथ करे और उससे िफरे नहीं तो उसे अवशय पाता है ।
संतजन और सतशास के उपदे शरप उपाय से उसके अनुसार िचत का िवचरना पुरषाथथ है
और उससे इतर जो चेषा है उसका नाम उनमत चेषा है । मूखथ और पामर लोग उसी मे अपना
जनम गँवा दे ते है । उन जैसे अभागो का संग करना यह अपने हाथो से अपने पैर मे कुलहाडी
मारना है ।
हे रघुकुलितलक शी राम ! केवल चैतनय आतमततव है । उसमे िचत संवेदन सपनदनरप है ।
यह िचत-संवेदन ही अपने पुरषाथथ से गरड पर आरढ होकर िवषणुरप होता है और नारायण
कहलाता है । यही िचत-संवेदन अपने पुरषाथथ से रदरप हो परमशािनतरप को धारण करता है ।
चनदमा जो हदय को शीतल और उललासकताथ भासता है इसमे यह शीतलता पुरषाथथ से हुई है ।
एक जीव पुरषाथथ बल से ही ितलोकपित इनद बनकर चमकता है और दे वताओं पर आजा चलाता
है । मनुषय तो कया दे वताओं से भी पूजा जाता है । कहाँ तो साधारण जीव और कहाँ ितलोकी मे
इनददे व बन कर पूजा जाना ! सब पुरषाथथ की बिलहारी है ।
बह
ृ सपित ने दढ पुरषाथथ िकया इसिलए सवद
थ े वताओं के गुर हुए। शुकजी अपने पुरषाथथ के
दारा सब दै तयो के गुर हुए है । दीनता और दिरदता से पीिडत नल और हिरशनद जैसे महापुरष
पुरषाथथ से ही िसद होता है । पुरषाथथ से जो सुमेर का चूणथ करना चाहो तो वो भी हो सकता है ।
अपने हाथ से जो चरणामत
ृ भी नहीं ले सकता वह यिद पुरषाथथ करे तो पि
ृ वी को खणड-खणड
करने मे समथथ हो जाता है । पुरषाथथ करे तो पि
ृ वी को खणड करने करने मे समथथ हो जाता है ।
हे रामजी ! िचत जो कुछ वांछा करता है और शास के अनुसार पुरषाथथ नहीं करता सो
सुख न पालेगा, कयोिक उसकी उनमत चेषा है ।
पौरष भी दो पकार का है । एक शास के अनुसार और दस
ू रा शासिवरद।
जो शास को तयागकर अपने इचछा के अनुसार िवचरता है सो िसदता न पावेगा और जो
शास के अनुसार पुरषाथथ करे गा वह िसदता को पावेगा। वह कदािचत दःुखी न होगा।
हे राम ! पुरषाथथ ही परम दे व है । पुरषाथथ से ही सब कुछ िसद होता है । दस
ू रा कोई दै व
नहीं है । जो कहता है िक "जो कुछ करे गा सो दे व करे गा।" वह मनुषय नहीं गदथ भ है । उसका संग
करना दःुख का कारण है ।
मनुषय को पथम तो यह करना चािहए िक अपने वणाश
थ म के शुभ आचारो को गहण करे
और अशुभ का तयाग करे । िफर संतो का संग और सतशासो का िवचार करे । अपने गुण और
दोष भी िवचारे िक िदन और राित मे अशुभ कया है । िफर गुण और दोषो का साकी होकर संतोष,
धैयथ, िवराग, िवचार और अभयास आिद गुणो को बढावे और दोषो का तयाग करे । जीव जब ऐसे
पुरषाथथ को अंगीकार करे गा तब परमाननदरप आतमततव को पावेगा।
वन का मग
ृ घास, तण
ृ और पतो को रसीला जानकर खाता है । िववेकी मनुषय को उस
मग
ृ की भांित सी, पुत, बानधव, धनािद मे मगन नहीं होना चािहए। इनसे िवरक होकर, दाँत
भीँ चकर संसारसमुद से पार होने का पुरषाथथ करना चािहए। जैसे केसरी िसंह बल करके िपंजरे मे
से िनकल जाता है वैसे ही संसार की कैद से िनकल जाने का नाम पुरषाथथ है । नशर चीजे
बढाकर, अहं को बढाकर, चीख-चीखकर मर जाने का नाम पुरषाथथ नहीं है ।
एक भगतडा था सब दे वी दे वताओं का मानता था और आशा करता थाः "मुझे कोई
मुसीबत पडे गी तब दे वी दे वता मेरी सहायता करे गे।" शरीर से हटटाकटटा, मजबूत था। बैलगाडी
चलाने का धनध करता था।
(अनुकम)
एक िदन उसकी बैलगाडी कीचड मे फँस गई। वह भगतडा बैलगाडी पर बैठा-बैठा एक-एक
दे व को पुकारता था िक- 'हे दे व! मुझे मदद करो। मेरी नैया पार करो। मै दीन हीन हूँ। मै िनबल

हूँ। मेरा जगत मे कोई नहीं। मै इतने वषो मे तुमहारी सेवा करता हूँ... फूल चढाता हूँ... सतुित
भजन गाता हूँ। इसिलए गाता था िक ऐसे मौके पर तुम मेरी सहाय करो।"
इस पकार भगतडा एक-एक दे व को िगडिगडाता रहा। अनधेरा उतर रहा था। िनजन
थ और
सननाटे के सथान मे कोई चारा न दे खकर आिखर उसने हनुमान जी को बुलाया। बुलाता रहा....
बुलाता रहा....। बुलाते-बुलाते अनजाने मे िचत शानत हुआ। संकलप िसद हुआ। हनुमान जी पकट
हुए। हनुमान जी को दे खकर बडा खुश हुआ।
"और सब दे वो को बुलाया लेिकन िकसी ने सहायता नहीं की। आप ही मेरे इषदे व है । अब
मै आपकी ही पूजा करँगा।"
हनुमान जी ने पूछाः "कयो बुलाया है ?"
भगतडे ने कहाः "हे पभु ! मेरी बैलगाडी कीचड मे फँसी है । आप िनकलवा दो।"
पुरषाथम
थ ूितथ हनुमान जी ने कहाः "हे दब
ु ुिथद ! तेरे अनदर अथाह सामियथ है , अथाह बल है ।
नीचे उतर। जरा पुरषाथथ कर। दब
ु ल
थ िवचारो से अपनी शिकयो का नाश करने वाले दब
ु ुिथद !
िहममत कर नहीं तो िफर गदा मारँगा।"
िनदान, वह हटटाकटटा तो था ही। लगाया जोर पिहए को। गाडी कीचड से िनकालकर
बाहर कर दी।
हनुमान जी ने कहाः "यह बैलगाडी तो कया, तू पुरषाथथ करे तो जनमो-जनमो से फँसी हुई
तेरी बुिदरपी बैलगाडी संसार के कीचड से िनकालकर परम ततव का साकातकार भी कर सकता
है , परम ततव मे िसथर भी हो सकता है ।
तसय पजा पित िह ता
जैसे पकाश के िबना पदाथथ का जान नहीं होता उसी पकार पुरषाथथ के िबना कोई िसिद
नही होती। िजस पुरष ने अपना पुरषाथथ तयाग िदया है और दै व (भागय) के आशय होकर
समझता है िक "दै व हमारा कलयाण करे गा" ते वह कभी िसद नहीं होगा। पतथर से कभी तेल
नहीं िनकलता, वैसे ही दै व से कभी कलयाण नहीं होता। विशषजी िकतना सुनदर कहते है !
"हे िनषपाप शी राम ! तुम दै व का आशय तयाग कर अपने पुरषाथथ का आशय करो।
िजसने अपना पुरषाथथ तयागा है उसको सुनदरता, कािनत और लकमी तयाग जाती है ।"
िजस पुरष ने ऐसा िनशय िकया है िक 'हमारा पालने वाला दै व है ' वह पुरष है जैसे कोई
अपनी भुजा को सपथ जानकर भय खा के दौडता है और दःुख पाता है ।
(अनुकम)
पुरषाथथ यही है िक संतजनो का संग करना और बोधरपी कलम और िवचाररपी सयाही से
सतशासो के अथथ को हदयरपी पत पर िलखना। जब ऐसे पुरषाथथ करके िलखोगे तब संसार रपी
जालल मे न िगरोगे। अपने पुरषाथथ के िबना परम पद की पािप नहीं होती। जैसे कोई अमत
ृ के
िनकट बैठा हो तो पान िकये िबना अमर नहीं होता वैसे ही अमत
ृ के भी अमत
ृ अनतयाम
थ ी के
पास बैठकर भी यिद िववेक.... वैरागय जगाकर इस आतमरस का पान नहीं करते तब तक अमर
आननद की पािप नहीं होती।
हे राम जी ! अजानी जीव अपना जनम वयथथ खोते है । जब बालक होते है तब मूढ
अवसथा मे लीन रहते है , युवावसथा मे िवकार को सेवते है और वद
ृ ावसथा मे जजरथीभूत हो जाते
है । जो अपना पुरषाथथ तयाग कर दै व का आशय लेते है वे अपने हनता होते है । वे कभी सुख
नहीं पाते। जो पुरष वयवहार और परमाथथ मे आलसी होकर तथा पुरषाथथ को तयाग कर मूढ हो
रहे है सो दीन होकर पशुओं के सदश दःुख को पाप होते है ।
पूवथ मे जो कोई पाप िकया होता है उसके फलसवरप जब दःुख आता है तब मूखथ कहता
है िकः 'हा दै व....! हा दै व....!' उसका जो पूवथ का पुरषाथथ है उसी का नाम दै व है , और कोई दै व
नहीं। जो कोई दै व कलपते है सो मूखथ है । जो पूवथ जनम मे सुकृत कर आया है वही सुकृत सुख
होकर िदखाई दे ता है । जो पूवथ जनम मे दषुकृ त कर आया है वही दषुकृ त दःुख होकर िदखाई दे ता
है । जो वतम
थ ान मे शुभ का पुरषाथथ करता, सतसंग और सतशास को िवचारता है , दढ अभयास
करता है वह पूवथ के दषुकृ त को भी जीत लेता है । जैसे पहले िदन पाप िकया हो और दस
ू रे िदन
बडा पुणय करे तो पूवथ के संसकार को जीत लेता है । जैसे बडे मेघ को पवन नाश करता है , वषाथ
के िदनो मे पके खेत को ओले नष कर दे ते है वैसे ही पुरष का वतम
थ ान पयत पूवथ के संसकारो
को नष करता है ।
हे रघुकुलनायक ! शष
े पुरष वही है िजसने सतसंग और सतशास दारा बुिद को तीकण
करके संसार-समुद से तरने का पुरषाथथ िकया है । िजसने सतसंग और सतशास दारा बुिद तीकण
नहीं की और पुरषाथथ को तयाग बैठा है वह पुरष नीच से नीच गित को पावेगा। जो शष
े पुरष है
वे अपने पुरषाथथ से परमाननद पद को पावेगे, िजसके पाने से िफर दःुखी न होगे। दे खने मे जो
दीन होता है वह भी सतशासानुसार पुरषाथथ करता है तो उतम पदवी को पाप होता है । जैसे
समुद रतो से पूणथ है वैसे ही जो उतम पयत करता है उसको सब समपदा आ पाप होती है और
परमाननद से पूणथ रहता है ।
(अनुकम)
हे राम जी ! इस जीव को संसार रपी िवसूिच का रोग लगा है । उसको दरू करने का यही
उपाय है िक संतजनो का संग करे और सतशासो मे अथथ मे दढ भावना करके, जो कुछ सुना है
उसका बारं बार अभयास करके, सब कलपना तयाग कर, एकाग होकर उसका िचनतन करे तब
परमपद की पािप होगी और दै त भम िनवत
ृ होकर अदै तरप भासेगा। इसी का नाम पुरषाथथ है ।
पुरषाथथ के िबना पुरष को आधयाितमक आिद ताप आ पाप होते है और उससे शािनत नहीं पाता।
हे रामजी ! तुम भी रोगी न होना। अपने पुरषाथथ के दारा जनम-मरण के बनधन से मुक
होना। कोई दै व मुिक नहीं करे गा। अपने पुरषाथथ के दारा ही संसारबनधन से मुक होना है । िजस
पुरष ने अपने पुरषाथथ का तयाग िकया है , िकसी और को भागय मानकर उसके आिशर हुआ है
उसके धमथ, अथथ और काम सभी नष हो जाते है । वह नीच से नीच गित को पाप होता है । जब
िकसी पदाथथ को गहण करना होता है तो भुजा पसारने से ही गहण करना होता है और िकसी
दे श को जाना चाहे तो वह चलने से ही पहुँचता है , अनयथा नहीं। इससे पुरषाथथ िबना कुछ िसद
नहीं होता। 'जो भागय मे होगा वही िमलेगा' ऐसा जो कहता है वह मूखथ है । पुरषाथथ ही का नाम
भागय है । 'भागय' शबद मूखो का पचार िकया हुआ है ।
हे अनघ ! िजस पुरष ने संतो और शासो के अनुसार पुरषाथथ नहीं िकया उसका बडा
राजय, पजा, धन और िवभूित मेरे दे खते ही दे खते कीण हो गई और वह नरक मे गया है । इससे
मनुषय को सतशासो और सतसंग से शुभ गुणो को पुष करके दया, धैयथ, संतोष और वैरागय का
अभयास करना चािहए। जैसे बडे ताल से मेघ पुष होता है और िफर मेघ वषाथ करके ताल को पुष
करता है वैसे ही शुभ गुणो से बुिद पुष होती है और शुद बुिद से गुण पुष होते है ।
हे राघव ! शुद चैतनय जो जीव का अपना आप वासतवरप है उसके आशय जो आिद
िचत-संवेदन सफुरता है सो अहं -ममतव संवेदन होकर फुनरे लगता है । इिनदयाँ भी अहं ता से
सफुरती है । जब यह सफुरता संतो और शासो के अनुसार हो तब पुरष परम शुिद को पाप होता
है और जो शासो के अनुसार न हो तो जीव वासना के अनुसार भाव-अभावरप भमजाल मे पडा
घटीयंत की नाई भटककर कभी शािनतमान नहीं होता। अतः हे राम जी ! जानवान पुरषो और
बहिवदा के अनुसार संवेदन और िवचार रखना। जो इनसे िवरद हो उसको न करना। इससे
तुमको संसार का राग-दे ष सपशथ न करे गा और सबसे िनलप
े रहोगे।
हे िनषपाप शीराम ! िजन पुरष से शांित पाप हो उनकी भली पकार सेवा करनी चािहए,
कयोिक उनका बडा उपकार है िक वे संसार समुद से िनकाल लेते है । संतजन और सतशास भी वे
ही है िजनकी संगित और िवचार से िचत संसार से उपराम होकर उनकी ओर हो जाये। मोक का
उपाय वही है िजससे जीव और सब कलपना को तयाग कर अपने पुरषाथथ को अंगीकार करे और
जनम मरण का भय िनवत
ृ हो जाये।
(अनुकम)
जीव जो वांछा करता है और उसके िनिमत दढ पुरषाथथ करता है तो अवशय वह उसको
पाता है । बडे तेज और िवभूित से समपनन जो दे खा और सुना जाता है वह अपने पुरषाथथ से ही
हुआ है और जो म हा िनकृष सप थ , कीट आ िद त ुम को द िष म े आत े ह ै उ नहोन े अ पने
पुरषाथ थ का तयाग िकया ह ै तभी ऐस े ह ु ए ह ै।
हे रामजी ! अपने पुरषाथथ का आशय करो नहीं तो सपथ, कीटािदक नीच योिन को पाप
होगे। िजस पुरष ने अपने पुरषाथथ तयागा है और िकसी दै व का आशय िलया है वह महामूखथ है ।
यह जो शबद है िक "दै व हमारी रका करे गा" सो िकसी मूखथ की कलपना है । हमको दै व का
आकार कोई दिष नहीं आता और न दै व कुछ करता ही है । कयोिक अिगन मे जा पडे और दै व
िनकाल ले तब जािनये िक कोई दे व भी है , पर सो तो नहीं होता। सनान, दान, भोजन आिद को
तयाग करके चुप हो बैठे और आप ही दै व कर जावे सो भी िकये िबना नहीं होता। जीव का
िकया कुछ नहीं होता और दै व ही करने वाला होता तो शास और गुर का उपदे श भी नहीं होता।
हे राघव ! जीव जब शरीर को तयागता है और शरीर नष हो जाता है , तब जो दै व होता तो
चेषा करता, पर सो तो चेषा कुछ नहीं होती। इससे जाना जाता है िक ऐव शबद वयथथ है । पुरषाथथ
की वाताथ अजानी जीव को भी पतयक है िक अपने पुरषाथथ िबना कुछ नहीं होता । गोपाल भी
जानता है िक मै गौओं को न चराऊँ तो भूखी रहे गी। इससे वह और दै व के आशय नहीं बैठता।
आप ही चरा ले आता है । दै व यिद पढे िबना पिणडत करे तो जािनये िक दै व ने िकया, पर पढे
िबना पिणडत तो नहीं होता। जो अजानी जानवान होते है सो भी अपने पुरषाथथ से ही होते है । ये
जो िवशािमत है , इनहोने दै व शबद दरू से ही तयाग िदया है और अपने पुरषाथथ से ही कितय से
बाहण हुए है ।
यिद कुछ पुरषाथथ न िकया होता तो पाप करने वाले नरक न जाते और पुणय करने वाले
सवगथ न जाते। पर सो तो होता नहीं। जो कोई ऐसा कहे िक कोई दै व करता है तो उसका िसर
कािटये तब वह दै व के आशय जीता रहे तो जािनये िक कोई दै व है , पर सो तो जीता नहीं। इससे
हे रामजी ! दै व शबद िमिया भम जानकर संतजनो और सतशासो के अनुसार अपने पुरषाथथ से
आतमपद मे िसथत हो।"
रामजी ने पूछाः "हे सवध
थ मथ के वेता ! आप कहते है िक दै व कोई नहीँ परनतु इस लोक मे
पिसद है िक बहा दै व है और दै व का िकया सब कुछ होता है ।"
विशषजी बोलेः "हे पशकताओ
थ ं मे शष
े शीराम ! मै तुमहे इसिलए कहता हूँ िक तुमहारा भम
िनवत
ृ हो जाए। अपने िकये हुए शुभ अथवा अशुभ कमथ का फल अवशयमेव भोगना पडता है ।
उसे दै व कहो या पुरषाथथ कहो। इसके अितिरक और कोई दै व नहीं है । मूखो को कहनाने के
िनिमत दै व शबद कहा है । जैसे आकाश शूनय है वैसे दै व भी शूनय है ।"
िफर रामजी बोलेः "भगवन ! आप कहते है िक दै व कोई नहीं और आकाश की नाई शूनय
है सो आपके कहने से भी दै व िसद होता है । जगत मे दै व शबद पिसद है ।
(अनुकम)
विशषजी बोलेः "हे राम जी ! मै इसिलए तुमहे कहता हूँ िक िजससे दै व शबद तुमहारे हदय
से उठ जाये। दै व नाम पुरषाथथ का है , पुरषाथथ कमथ का नाम है और कमथ नाम वासना का है ।
वासना मन से होती है और मनरपी पुरष िजसकी वासना करता है सोई उसको पाप होता है ।
जो गाँव को पाप होने की वासना करता है सो गाँव को पाप होता है और घाट की वासना करता
है तो घाट को पाप होता है ।
पूवथ का जो शुभ अशुभ दढ पुरषाथथ िकया है उसका पिरणाम सुख-दःुख से अवशय होता है
और उसी पूवथ के पुरषाथथ का नाम दै व है । जीव जो पाप की वासना और शासिवरद कमथ करता
है सो कयो करता है ? पूवथ के दढ कुसंसकारो से ही पाप करता है । जो पूवथ का पुणयकमथ िकया
होता तो शुभ मागथ मे िवचरता।"
रामजी ने पूछाः "हे संशयरपी कुहरे के नाशकताथ सूयथ ! जो जीव सोचता है िक, पूवथ की
दढ वासना के अनुसार मै िवचरता हूँ। अब मै कया करँ? मुझको पूवथ की वासना ने दीन िकया है ।
तो ऐसे जीव को कया करना चािहए?"
विशषजी बोलेः "हे रघुकुलभूषण राम ! जीव पूवथ की दढ वासना के अनुसार िवचरता है पर
जो शष
े मनुषय है सो अपने पुरषाथथ से पूवथ के मिलन संसकारो को शुद करता है । जब तुम
सतशासो और जानवानो के वचनो के अनुसार दढ पुरषाथथ करोगे तब मिलन वासना दरू हो
जायेगी। पूवथ के शुभ और मिलन संसकारो को कैसे जािनये, सो सुनो।
जो िचत िवषय और शासिवरद मागथ की ओर जावे, शुभ की ओर न जावे तो जािनये िक
कोई पूवथ का कोई मिलन कमथ है । जो िचत संतजनो और सतशासो के अनुसार चेषा करे और
संसारमागथ से िवरक हो तो जािनये िक पूव थ का कोई शुभ कमथ है ।
हे राम जी ! यिद पूवथ का संसकार शुद है तो तुमहारा िचत सतसंग और सतशासो के
वचनो को गहण करके शीघ आतमपद को पाप होगा और जो तुमहारा िचत शुभ मागथ मे िसथर
नहीं हो सकता तो दढ पुरषाथथ करके संसार समुद से पार हो। तुम चैतनय हो, जड तो नहीं हो।
अपने पुरषाथथ का आशय करो। मेरा यही आशीवाद
थ है िक तुमहारा िचत शीघ ही शुद आचरण
और बहिवदा के िसदानतासार मे िसथत हो।
हे राम जी ! शष
े पुरष वही है िजसका पूवथ का संसकार यदिप मिलन भी था, लेिकन संतो
और सतशासो के अनुसार दढ पुरषाथथ करके िसदता को पाप हुआ है । मूखथ जीव वह है िजसने
अपना पुरषाथथ तयाग िदया है और संसार मुक नहीं होता। पूवथ का जो कोई पापकमथ िकया जाता
है उसकी मिलनता से पाप मे दौडता है और अपना पुरषाथथ तयागने से अनधा होकर िवशेष
दौडता है ।
(अनुकम)
जो शष
े पुरष है उसको यह करना चािहए िक पथम पाँचो इिनदयो को वश मे करे , िफर
शास के अनुसार उनको बताव
थ े और शुभ वासना दढ करे , अशुभ वासना का तयाग करे । यदिप
दोनो वासनाएँ तयागनीय है , पर पथम शुभ वासना को इकटठी करे और अशुभ का तयाग करे ।
जब शुद होगा तब संतो का िवचार उतपनन होगा। उससे आतमजान की पािप होगी। उस जान के
दारा आतम-साकातकार होगा। िफर िकया और जान का भी तयाग हो जायेगा। केवल शुद
अदै तरप अपना आप शेष भासेगा।
हे राम जी ! मेरे ये वचनो को तुम गहण करो। ये वचन बानधव के समान है । ये तुमहारे
परम िमत होगे और दःुख से तुमहारी रका करे गे। यह िचत जो संसार के भोग की ओर जाता है
उस भोग रपी खाई मे उसे िगरने मत दो। भोग को तयाग दो। यह तयाग तुमहारा परम िमत
होगा। और तयाग भी ऐसा करो िक िफर उसका गहण न हो। इससे परमाननद की पािप होगी।
पथम शम और दम को धारण करो। समपूणथ संसार की वासना तयाग करके उदारता से
तप
ृ रहने का नाम शम है और बाह इिनदयो को वश मे करने का नाम दम है । जब पथम इन
शम-दम को धारण करोगे तब परम ततव का िवचार आप ही उतपनन होगा और िवचार से िववेक
दारा परमपद की पािप होगी, िजस पद को पाकर िफर कदािचत दःुख न होगा और अिवनाशी
सुख तुम को पाप होगा। इसिलए इस मोकउपाय संिहता के अनुसा दढ पुरषाथथ करो तब
आतमपद को पाप होगे।"

संकलपब ल के िसतार े
महाक िव कािल दास
संसकृ त सािहतय के भासकर महाकिव कािलदास िजस पकार महाकिव बने यह एक पचंड
पुरषाथथ और दढ संकलपबल की गाथा है ।
िवदोतमा नाम की एक राजकुमारी बहुत िवदान थी। उसने घोषणा की थी िक जो पुरष
मुझे शासाथथ मे हरा दे गा उसी के साथ मै शादी करँगी, अनय िकसी के साथ नहीं। इस रप
लावणयवती िवदान राजकुमारी को पाप करने के िलए िकतने ही राजकुमार आये। अब राजकुमार
कया शासाथथ करे गे ! अपना सा मुह
ँ लेकर वापस लौट गये। िवदानो के युवान पुत भी शासाथथ
करने आये लेिकन राजकुमारी ने सब को हरा िदया।
सब थके। िवदान पिणडतो के पुत भी अपमानयुक पराजय पाकर आये यह दे खकर पिणडतो
के अहं को चोट लगी। उनको गुससा आया िकः "एक कनया ने, अबला सी ने हमारे पुतो को हरा
िदया ! उस राजकुमारी को हम सब सबक िसखाकर ही रहे गे।"
सब पिणडतो ने िमलकर एक षडयनत रचा। िनणय
थ िकया िक उस गिवत
थ राजकुमारी की
शादी कौई मूखथ के साथ करा दे तभी हम पिणडत पकके।
(अनुकम)
उनहोने खोज िलया एक मूखथ.... महामूख।थ पेड पर चढकर िजस डाल पर खडा था उसी
डाल को उसके मूल से काट रहा था। उससे बडा मूखथ और कौन हो सकता है ? पिणडतो ने सोचा
िक यह दल
ू हा ठीक है । राजकुमारी की शादी इसके साथ करा दे । उनहोने उससे कहाः "हम तेरी
शादी राजकुमारी के साथ करा दे ते है लेिकन एक शतथ है । तुमहे मौन रहना होगा। कुछ बोलना
नहीं। बाकी हम सब संभाल लेगे।"
िवदानो की सभा मे मूखो का मौन ही उिचत है ... और भगवान की भिक के िलए सबका
मौन आवशयक है ।
पिणडत लोग उस मूखथ को ले गये। एक िवदान के योगय वस पहना िदये। जो कुछ
वेशभूषा करनी थी, करा दी। उसे बडा मौनी गुर होने का ढोग रचा कर राजकुमारी के पास ले गये
और कहाः
"हमारे गुर जी आपके साथ शासाथथ करना चाहते है , परनतु वे मौन रहते है । आप मे
िहममत हो तो मौन इशारो से पश पूछो और इशारो से िदये जाने वाले उतर समझो। उनके साथ
यिद शासाथथ नहीं करोगी तो हम समझेगे िक तुम कायर हो।"
राजकुमारी के िलए यह चुनौती थी। उसको हाँ कहना पडा। पिणडतो की सभा िमली। इस
अभूत पूवथ शासाथथ दे खने सुनने के िलए भीड इकटठी हो गई। पिणडत लोग इन मौनी गुर के
कई िशषय होने का िदखावा करके उनको मानपूवक
थ सभा मे ले आये और ऊँचे आसन पर िबठा
िदया।
िबना वाणी का शासाथथ शुर हुआ। राजकुमारी ने गुर जी को एक उँ गली िदखाई। गुर जी
समझे िक यह राजकुमारी मेरी एक आँख फोड दे ना चाहती है । उनहोने बदले मे दो उँ गिलयाँ
िदखाई िक तू मेरी एक फोडे गी तो मै तेरी दो फोडू ँ गा।
पिणडतो ने अपने गुरजी की भाषा का अथघ
थ टन करते हुए राजकुमारी से कहाः "आप
कहते है िक ईशर एक है हमारे गुर जी कहते है िक एक ईशर से यह जगत नहीं बनता। ईशर
और ईशर की शिक माया, पुरष और पकृ ित इन दो से जगत भासता है ।"
बात युिकयुक और शाससममत थी। राजकुमारी कबूल हुई। िफर उसने दस
ू रा पश करते
हुए हाथ का पंजा िदखाया। मूखथ समझा िक यह राजकुमारी 'थपपड मारँगी' ऐसा मुझे कहती है ।
उसने मुटठी बनद करके घूँसा िदखायाः "यिद तू मुझे थपपड मारे गी तो मै तुझे घूँसा मारँगा, नाक
कुचल दँग
ू ा।''
पिणडतो ने राजकुमारी से कहाः "आप कहती है िक पाँच जानेिनदयाँ है । हमारे गुरजी
कहते है िक उन पाँचो इिनदयो को िसकुडने से परमातमा िमलते है ।"
िफर राजकुमारी ने सात उँ गिलयाँ िदखाई। मूखथ ने उस संखया को बढाकर नव ऊँगलीयाँ
िदखाई। पश से उतर सवाया होना चािहए न? पिणडतो ने राजकुमारी से कहाः "आप सात उँ गिलयो
के दारा पाँच जानेिनदयाँ, मन और बुिद, इस पकार सात की संखया बताती है । हमारे गुरजी कहते
है िक उसके साथ िचत और अहं कार भी िगनने चािहए। इस पकार सब िमलाकर नौ होते है ।"
(अनुकम)
राजकुमारी ने िजहा िदखाई। मूखथ ने मुँह पर हाथ धर िदयाः ''यिद तू िजहा िदखाएगी तो
मै तेरा मुँह बनद कर दँग
ू ा।"
आप कहती है िजहा से बोला जाता है लेिकन हमारे गुरजी कहते है िक वाणी का संयम
करने से शिक बढती है । बोलने से परमातमा नहीं िमलते। मौन का अभयास चािहए, अनतमुख

होने का अभयास होना चािहए, िजहा को िछपाने का अभयास चािहए। वयथथ बोलने वाले को जूते
खाने पडते है ।
इस पकार संसकृ त के िवदानो की सभा मे शासाथथ हुआ। पिणडतो ने अपने महािवदान
गुरजी के मौन इशारो का अथघ
थ टन शासोक िवचारधारा के अनुसार करके िदखाया। उनकी शास
सममत और युिकयुक बाते राजकुमारी को माननी पडीं। उस मूखथ के साथ राजकुमारी की शादी
हो गई।
राती हुई। दोनो महल मे गये। राजकुमारी ने िखडकी से बाहर झाँका तो बाहर ऊँट खडा
था। उसने अपने पितदे व से संसकृ त मे पूछाः "यह कया है ?" संसकृ त मे ऊँट को ऊष कहते है ।
मूखथ उस शबद को कया जाने? राजकुमारी समझ गई िक यह तो मूखथ है । धकका दे कर घर से
बाहर िनकाल िदया और बोलीः
"मूखथ ! तू मेरा पित कैसे हो सकता है ? जा िवदान होकर ही मुँह िदखाना। शादी तो हो
गई। मै दस
ू री शादी नहीं कर सकती। लेिकन िवदान होकर आयेगा तभी सवीकार करँगी।
युवक को चोट लग गई। वह जंगल मे चला गया। उसने िनशय िकया िक वह संसकृ त
का महान िवदान होकर ही रहूँगा।
अचल संकलपबल के आगे पितकूलताएँ कया िटकेगी? उपासना-आराधना करते-करते उसकी
कुणडिलनी शिक जागत
ृ हुई, काली के दशन
थ हुए। िचत मे साितवकता और संकलपबल हो तो काली
माता भी आयेगी और कृ षण भी आयेगे। िजसके आधार पर सब आकिषत
थ होकर आते है वह
आतमजान पाने के िलए भी िचत की शुिद चािहए।
िचत शुद होते ही दे वी पकट हुई और उस संकलपवान युवक को वरदान िदया िकः "जा
बेटा ! तू महान िवदान होगा, महाकिव के रप मे पिसद होगा।"
माँ काली पसनन हो जाये िफर कया कमी रहे ? जो पढे वह याद रह जाये। िजस पकार
जानी को जो िदखे सो बह। अजानी को जो िदखे वह मेरा.... मेरा.... तेरा पराया... और जानी को
जो िदखे वह बहसवरप। उसी पकार उस युवक को जो िदखे, जो पढने मे आये वह उसका हो
जाये। उसके ऊपर अपना अिधकार हो जाए।
ऐसे करते-करते वह युवक महान िवदान हो गया। इतना महान िवदान हुआ िक उसने
संसकृ त मे रघुवंश महाकावय िलखा। महाकिव कािलदास उसका नाम पडा। महाकिव कािलदास ने
शाकुनतल नाटक िलखा। और भी अनेक संसकृ त रचनाएँ उनहोने िलखी है । िवदे शी भाषाओँ मे
उनके अनुवाद हुए है ।
जमन
थ ी के गेटे नामक एक पिसद किव ने जब महाकिव कािलदास का 'शाकुनतल' नाटक
पढा तब वह इतना पसनन हो गया िक नाटक िसर पर रखकर खुलली सडको पर नाचने लगा।
ऐसा शाकुनतल नाटक महामूखथ मे महा िवदान, महाकिव बने हुए कािलदास दारा िलखा गया।
महापुरष वयिक को भी जब िदल मे चोट लग जाती है और सीना तान कर पुरषाथथ करने
लग जाता है तब उसकी समपूणथ चेतना उस िदशा मे मुड जाती है । वह चेतना पयतशील और
दढसंकलपवान को महामूखथ मे से महाकिव बना दे ती है ।
साधक भी यिद पूणथ उतसाह के साथ आतमसवरप को पहचानने मे अपनी पूरी चेतना
लगा दे तो िजसमे हजारो कािलदास जैसे उतपनन होकर िवलीन हो गये उस परमातमा का
साकातकार कर सके।
चा तक मीन पत ंग जब िपय िबन नही ं रह पाय।
सा धय को पाय े िबना स ाधक कयो रह जाय।।
मनुषय जीवन घडाई के िलए ही है । उसको आकार दे ने वाले कोई सदगुर िमल जाये। बस
िफर तुमहे मोम जैसे नमथ बनना है । सदगुर अपना कायथ करके ही रहे गे। उनकी कृ पा िकसी से
बािधत नहीं होती। उनके दारा अनुशािसत होने का उतसाह हममे होना चािहए।
(अनुकम)
वेिल ंगटन
कोई वसतु िसथित ऐसी नहीं है जो संकलपबल और पुरषाथथ के दारा पाप न हो सके।
सकूल से भागा हुआ वेिलंगटन नाम का एक िकशोर लंडन की गिलयो से गुजरता हुआ एक
सरकारी उदान मे जा पहुँचा। इतने मे ऊँचे टावर की घंटी बजीः 'टन...टन...टन...!' वह िकशोर
टावर के उस नाद के साथ ताल िमलाकर गाने लगाः 'टन...टन...वेिलंगटन.... लोडथ मेयर ऑफ
लंडन...!' सवाभािवक मसती मे ही गा रहा था। अचानक उसे खयाल आया िकः 'मै गिलयो मे
भटकता, अनजान, अपिरिचत लडका इतने बडे लंडन शहर का मेयर? How is it possible? यह कैसे
संभव है ?
तुरनत उसके आनतर मन मे से दढता का सुर सुनाई पडाः ‘Why not?’ कयो नहीं? जंगल
की झािडयो मे जनम लेने वाला िलंकन यिद अमेिरका का राषपमुख बन सकता है तो मै इस
छोटे से लंडन शहर का मेयर कयो नहीं बन सकता? जरर बन सकता हूँ। मेयर होने के िलए जो
सदगुण चािहए, जो शिक चािहए, जो योगयता चािहए, जो कायक
थ मता चािहए, जो परदःुखभंजनता
चािहए वह सब मै िवकिसत करँगा। ये सब गुण मेरे जीवन मे आतमसात ् करँगा और मेयर
बनूँगा।'
उसने संकलप और पुरषाथथ का समनवय िकया। आिखर वह लंडन का मेयर होकर ही रहा।
वेिलंगटन लंडन का मेयर बन सका, तीव संकलप के बल पर। उसके संकलप की शिक उसे
िकसी भी पिरिसथित के योगय बना सके ऐसी थी। यिद उसके टावर के नाद मे टन...टन....
वेिलंगटन.... एनजल ऑफ गॉड (ईशर का दत
ू ).. सुनाई िदया होता तो वह केवल लंडन का मेयर ही
नहीं, पूरे िवश का पेमपूणथ िबनहरीफ मेयर बन गया होता। मन एक महान कलपवक
ृ है इस बात
का खयाल अवशय रखना।
(अनुकम)
हेन री कैझर
ऐसा ही दस
ू रा िकशोर हे नरी कैझर जब तेरह वषथ की उम मे नौकरी की तलाश मे िनकला
था तो कोई उसे नौकरी नहीं दे ता था। सब उसे दतुकार दे ते, िनकम ् जानकर ितरसकार करते। तब
उस िकशोर ने मन ही मन महान उदोगपित बनने का दढ संकलप िकया। पचंड िहममत और
अथक पुरषाथथ से अपने लकय को हािसल करने के िलए कमर कस ली। एक िदन वह महान
उदोगपित बना ही। 58 वषथ की उम मे उसका औदोिगक सामाजय 50 दे शो मे फैल चुका था। 90
हजार लोग उसमे काम करते थे। उसका वािषक
थ उतपादन 1500 करोड रपये था। यह है
संकलपशिक और पुरषाथथ का जीवनत पमाण।
उस हे नरी कैझर को 13 वषथ की उम मे नौकरी की ठोकर लगने के बदले आतमजान की
पािप के िलए बहवेता सदगुर का इशारा िमल गया होता तो वह िकतनी ऊँचाई पर पहुँचा होता?
आतमजान के िवरल पथ पर यिद वह चला होता तो िसफथ 50 दे शो मे ही नहीं बिलक अनंत
बहांडो मे उसकी आतमा का सामाजय होता। केवल 90 हजार ही नहीं बिलक समग िवश के लोग
उसके सामाजय मे मात आय ही नहीं लेिकन आतमशांित को उपलबध होते और 1500 करोड रपये
ही नहीं, पूरे िवश के समग उतपादन पर उसकी आतमसता की मुहर लगी होती। यिद पिरशम
करना ही है तो नशर चीजो के िलए कयो करे ? हमारी दढ संकलपशिक को सथूल जगत के नशर
भोग एवं अहं -पोषक सताओं के पीछे नष न करे िकनतु परम सतय का साकातकार करने मे
लगाये।
(अनुकम)
नेपो िलयन बोनापाट थ
नेपोिलयन बोनापाटथ एक गरीब कुटु ं ब मे जनमा था। एक साधारण सैिनक की है िसयत से
नौकरी का पारमभ िकया। दढ संकलपबल और पुरषाथथ से एक िदन फाँस का शहनशाह बन गया।
15 वषथ तक समग यूरोप पर चकवती शासन िकया वह कौन सी शिक के आधार पर? वह शिक
थी पबल पुरषाथथ और दढ संकलप। दढ संकलपबल उसका जीवनमंत था। वह कहताः
"Nothing is impossible to a willing mind. इचछाशिक वाले के िलए कुछ भी असंभव नहीं
है ।"
"Impossible is a word to be found in the dictionary of fools. 'असंभव' शबद मूखथ लोगो के
शबदकोष मे से िमले ऐसा शबद है ।
नेपोिलयन तो यहाँ तक कहता था िकः "Impossible is not a French Word. 'असंभव' शबद
फेनच भाषा का शबद नहीं है ।"
नेपोिलयन के पास दढसंकलपबल और अथाह मनोबल था। उसकी वजह से वह एक
साधारण सैिनक मे से नेपोिलयन बोनापराटथ बन गया। परनतु उसके जीवन के उषःकाल मे ही
उसे यिद कोई संत िमल गये होते और उसको अधयातम के िशखर पर पहुँचने का धयेय िसखाया
होता तो कया वह समग िवश का 'आतम-समाट' न बन गया होता? अवशय बन गया होता। (अनुक
म)
रणजीत िसं ह
पंजाबकेसरी रणजीत िसंह के बचपन की यह बात है । उनके िपता महािसंह के पास एक
जौहरी जवाहरात लेकर आया। राजा, रानी और राजकौर जवाहरात दे खने बैठे। जौहरी उतसाहपूवक

एक के बाद एक चीज िदखाता। इतने मे बाल कुमार का आगमन हुआ। लाडले कुमार ने कहाः
"िपता जी ! मेरे िलए भी हीरे की एक अंगूठी बनवाओ न ! मेरी इस उँ गली पर वह
शोभायमान होगी।"
िपता का पेम उमड पडा। रणजीत िसंह को आिलंगन दे ते हुए वे बोलेः "मेरा पुत ऐसे
साधारण हीरे कयो पहने? ये हीरे तो साधारण है ।"
राजकौर ने पूछाः "तो िफर आपका इकलौता बेटा कैसे हीरे पहनेगा?"
महािसंह ने कोई दढ सवर से कहाः "कोहीनूर।"
राजकौर ने पूछाः "कोहीनूर अब कहाँ है पता है ?"
महािसंहः "हाँ। अभी वह कोहीनूर अफगािनसतान के एक अमीर के पास है । मेरा लाल तो
वही हीरा पहनेगा। कयो बेटा पहनेगा न?"
रणजीत िसंह ने िसर िहलाकर कहाः "जी िपता जी ! ऐसे साधारण हीरे कौन पहने? मै तो
कोहीनूर ही पहनूँगा।"
......और आिखर रणजीत िसंह कीहीनूर पहन कर ही रहे ।
िपता ने यिद इस बालक के िचत मे संत होने के या परमातमपािप करने के उचच संसकार
डाले होते तो वह महतवाकांकी और पुरषाथी बालक मात पंजाब का सवामी ही नहीं बिलक लोगो
के हदय का सवामी बना होता। लोगो के हदय का सवामी तो बने या नहीं बने लेिकन अपने
हदय का सवामी तो बनता ही। ..... और अपने हदय का सवामी बनने जैसा, अपने मन का सवामी
बनने जैसा बडा कायथ जगत मे और कोई नहीं है । कयोिक यही मन हमे नाच नचाता है , इधर
उधर भटकाता है । अतः उठो जागो। अपने मन के सवामी बन कर आतमततवरपी कोहीनूर धारण
करने की महतवाकांका के साथ कूद पडो संसार-सागर को पार करने के िलए। (अनुकम)
िवनोबा भावो
तुम जानते हो िक िवनोबा भावे संत कैसे बने? उनके बचपन का एक पसंग है ।
गली के बचचे इकटठे हुए थे। बात चली िक हरे क के पिरवार मे कौन-कौन संत हो गये।
हरे क बालक ने अपनी पीढी के िकसी पूवज
थ का नाम बताया। िवनोबा की बारी आई। वे कुछ न
बोल पाये। उनकी पीढी मे कोई संत नहीं हुआ था। उनहोने मन ही मन िनशय िकया और जािहर
भी िकया िकः "हमारी पीढी मे कोई संत नहीं हुआ है तो मै सवयं संत होकर िदखाऊँगा।
अपने संकलप की िसिद के िलए उनहोने पचंड पुरषाथथ का पारमभ कर िदया। लग गये
अपना लकय हािसल करने मे और आिखर एक महान संत बन कर पिसद हुए।
संकलपशिक कया नहीं कर सकती? हमेशा ऊँचे संकलप करो और उनको िसद करने के
िलए पबल पुरषाथथ मे लग जाओ। अपने संकलप को ठं डा मत होने दो, अनयथा दस
ू रो के संकलप
तुमहारे मन पर हावी हो जावेगे और कायिथसिद का मागथ रं ध जायेगा। तुम सवयं िसिद का
खजाना हो। सामियथ की कुंजी तुमहारे पास ही है । अपने मन को मजबूत बना लो तो तुम
पूणर
थ पेण मजबूत हो। िहममत, दढ संकलप और पबल पुरषाथथ से ऐसा कोई धयेय नहीं है जो िसद
न हो सके। नशर की पािप के िलए पयत करोगे तो नशर फल िमलेगा और शाशत की पािप के
िलए पयत करोगे तो शाशत फल िमलेगा।
(अनुकम)
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